Friday, 10 November 2017

Of Human Bondage : Revisited !

The character and conduct of a person gets a shining finish from the experiences in his life but surely considerably from books he reads. The Novel “Of Human Bondage” (1915) written by W. Somerset Maugham also left a permanent imprint on the way I would be behaving. I was at that time, in the same age group, in which the main character of the novel, Philip was; 25 and aggressive..

Philip was born club footed right leg. He had a difficult life living with the disability more so when even his companions made a mockery. After becoming a qualified doctor, he lands in a Government hospital as an assistant to one 70 years old, Dr. South. Dr.South had cultivated an irritating nature with the age.

Philip became immediately popular with the patient to the annoyance of Dr. South, One day, the aged doctor burst out.

The proceeding would get diffused if not produced verbatim in the words of the author. It goes like this:

One evening, when Philip had reached his last week with Doctor South, a child came to the surgery door while the old doctor and Philip were making up prescriptions. It was a little ragged girl with a dirty face and bare feet. Philip opened the door.

"Please, sir, will you come to Mrs. Fletcher's in Ivy Lane at once?"

"What's the matter with Mrs. Fletcher?" called out Doctor South in his rasping voice.

The child took no notice of him, but addressed herself again to Philip.

"Please, sir, her little boy's had an accident and will you come at once?"

"Tell Mrs. Fletcher I'm coming," called out Doctor South.

The little girl hesitated for a moment, and putting a dirty finger in a dirty mouth stood still and looked at Philip.

"What's the matter, Kid?" said Philip, smiling.

"Please, sir, Mrs. Fletcher says, will the new doctor come?" There was a sound in the dispensary and Doctor South came out into the passage.

"Isn't Mrs. Fletcher satisfied with me?" he barked. "I've attended Mrs. Fletcher since she was born. Why aren't I good enough to attend her filthy brat?"

The little girl looked for a moment as though she were going to cry, then she thought better of it; she put out her tongue deliberately at Doctor South, and, before he could recover from his astonishment, bolted off as fast as she could run. Philip saw that the old gentleman was annoyed.

"You look rather fagged, and it's a goodish way to Ivy Lane," he said, by way of giving him an excuse not to go himself.

Doctor South gave a low snarl. "It's a damned sight nearer for a man who's got the use of both legs than for a man who's only got one and a half."

Philip reddened and stood silent for a while. "Do you wish me to go or will you go yourself?" he said at last frigidly.

"What's the good of my going? They want you."

Philip took up his hat and went to see the patient. It was hard upon eight o'clock when he came back. Doctor South was standing in the dining-room with his back to the fireplace.

"You've been a long time," he said.

"I'm sorry. Why didn't you start dinner?"

"Because I chose to wait. Have you been all this while at Mrs.Fletcher's?"

"No, I'm afraid I haven't. I stopped to look at the sunset on my way back, and I didn't think of the time."

Doctor South did not reply, and the servant brought in some grilled sprats. Philip ate them with an excellent appetite. Suddenly Doctor South shot a question at him.

"Why did you look at the sunset?"

Philip answered with his mouth full, "Because I was happy."

Doctor South gave him an odd look, and the shadow of a smile flickered across his old, tired face. They ate the rest of the dinner in silence; but when the maid had given them the port and left the room, the old man leaned back and fixed his sharp eyes on Philip.

"It stung you up a bit when I spoke of your game leg, young fellow?" he said.

"People always do, directly or indirectly, when they get angry with me."

"I suppose they know it's your weak point."

Philip faced him and looked at him steadily.

"Are you very glad to have discovered it?"

The doctor did not answer, but he gave a chuckle of bitter mirth. They sat for a while staring at one another. Then Doctor South surprised Philip extremely.

"Why don't you stay here and I'll get rid of that damned fool with his mumps?"

"It's very kind of you, but I hope to get an appointment at the hospital in the autumn. It'll help me so much in getting other work later."

"I'm offering you a partnership," said Doctor South grumpily.

"Why?" asked Philip, with surprise.

"They seem to like you down here."

"I didn't think that was a fact which altogether met with your approval,"

Philip said dryly,"D'you suppose that after forty years' practice I care a twopenny damn whether people prefer my assistant to me? No, my friend. There's no sentiment between my patients and me. I don't expect gratitude from them, I expect them to pay my fees. Well, what d'you say to it?"

Philip made no reply, not because he was thinking over the proposal, but because he was astonished. It was evidently very unusual for someone to offer a partnership to a newly qualified man; and he realised with wonder that, although nothing would induce him to say so, Doctor South had taken a fancy to him. He thought how amused the secretary at St. Luke's would be when he told him.

Saturday, 4 November 2017

पान के पत्ते

घर में कथा का आयोजन था । नुक्कड़ के पानवाले से 11 पान के ताजे पत्ते 22 रुपये में खरीदे । महंगा लगा । कदम कुआँ पटना के फकरू चाचा याद आ गए । 6/4 फीट की पान दुकान में क्या कुछ नहीं मिलता था । टॉफी, बिस्कुट, पान, सिगरेट और न जाने क्या-क्या । फकरू चाचा के अलावे तीन जन और बैठते थे सूप लेकर बीडी लपेटते हुए । फकरू चाचा की दाढ़ी कभी सफ़ेद और कभी नारंगी कैसे हो जाती थी वे कभी नहीं बताते थे । अलबत्ता जल्दी रफा-दफा करने की खातिर खरीदे गए सामान के साथ एक टॉफी जरूर मिल जाती थी । 1950-60 के दशक में कथा का वृहत आयोजन होता था । एक बार पान के पत्ते लेने मुझे भेजा गया । फकरू चाचा ने संजीदगी से दोनों हाथ धोये और नयी डाली खोल कर बिना गिनती किये पान के पत्ते दोने में लपेट कर दे दिए । उन्हें मालूम था कितने अदद पान के पत्ते लगेंगे। तब पैसे से ज्यादा मोल रिश्तों का हुआ करता था । उन्हें प्रसाद में बाटें जाने वाला आटे का चूरमा बहुत प्रिय था।  मैं कुछ और पूछता उसके पहले मुझे ताकीद के साथ मेरी टॉफी मिल गयी थी ।

Sunday, 22 October 2017

भोग प्रसाद

बहुत वर्षों बाद बहुत दिनों से बागल बाबा मंदिर में प्रतिष्ठित काली माँ का दर्शन करने की इच्छा हो रही थी । 2003 में अवकाश प्राप्ति के बाद, जब किसी दूसरे कार्य के लिए कॉलोनी गया तो बेसमय मंदिर जाने पर कपाट बंद मिलते थे ।
दीवाली की शाम मेरे बेटे ने भी अगली सुबह जाकर खिचड़ी प्रसाद पाने की इच्छा बतायी। बचपन में यश अपने साथियों के साथ लाइन लगकर प्रसाद पाता था । बहुतेरे तो डोलचा भरकर प्रसाद घर ले जाते थे। तय हुआ सुबह 6 बजे कार से निकलने का । बेटे यश का अमेरिका से कोई रिसर्च प्रोजेक्ट का अर्जेंट काम आ गया । देर से  सोया । नींद नहीं खुली । पर प्रसाद तो 7 बजे तक खत्म हो जाता । मैंने उसे जगाना उचित नहीं समझा । ज्यादा देर हो जाती ।
मन्दिर कोई 5 km दूर था ।  तबीयत नासाज थी । रिमझिम बारिश हो रही थी । मैंने आधे दूर का रास्ता ऑटो से और बाकी पैदल तय किया।  बहुत कुछ बदल गया था । बच्चों की नयी खेप प्रसाद लेकर वापिस जा रही थी । बूढ़े पुजारी अब नही रहे थे । माँ काली की मूर्ती का भी नया रंग रोगन हो गया था । खाली प्रांगण से एक नया विवाहित जोड़ा सकुचाते निकलता  दिखा । 
मन्दिर के प्रवेश द्वार पर यश भी पहुंच गया था । मैंने शांत वातावरण में दस मिनट पूजा की । यश हाथ जोड़ने के बाद तुरत प्रसाद काउंटर की ओर लपक गया था । 1 क्विंटल चावल से बना भोग प्रसाद खत्म हो गया था । खाली बर्तन धोये जा रहे थे । यश खाली हाथ मुझे निहार रहा था । मैं मायूस लौटने वाला ही था की एक बुजुर्ग महिला ने पीछे से आवाज लगाई । उसने अपने निजी  डोलचे से निकाल कर आधा भाग खिचड़ी प्रसाद दो दोने में मुझे दिया । मुझे प्रसाद पाने में जितना आनंद आ रहा था उससे कहीं ज्यादा प्रसन्नता उसे प्रसाद देने में आ रही थी । 15 वर्षों बाद भी उसने मुझे पहचान लिया था । लौटते वक्त बहुत कोशिश करने पर याद आया । प्रत्येक अमावस्या पूजा में वह भोग प्रसाद प्रकरण में योगदान देती थी । 
बहुत दिनों से सुनता आ रहा था की माँ के बुलावे पर ही दर्शन सम्भव होता है वह भी लगन और जांचने परखने के बाद ।

Monday, 9 October 2017

जीना इसी का नाम है - 1 !

बचपन का एक बेहतरीन आनंद पड़ोस के जज चाचा ने छीन लिया । दोनों के घर को बांटनेवाले 30x 4 फ़ीट के गलियारें में ही क्रिकेट खेलने की जगह बनती थी पर उनके खिड़की में कांच के शीशे लगे थे । इधर कुछ दिनों से मेरे सामने की खिड़की से सटकर बच्चे क्रिकेट खेलते रहते हैं । टेनिस बॉल कभी-कभी शीशे से भी टकराती रहती है । बच्चे जब सोये रहते हैं तो मैं नटखट बच्चों के दांत तोड़ लेता हूँ ये उन सभी को मालूम है । फिर भी वे डरते नहीं । उन्हें मालूम है की 100-200 रुपये के शीशे के चलते उनके अनमोल बचपन पर कोई अंकुश लगने वाला नहीं । खिड़की के बाहर का माहौल  बच्चे गुलज़ार रखते हैं और अंदर कंप्यूटर पर बैठा मैं ऊबता नहीं हूँ । मुझे बचपन जीना आता है ।

Wednesday, 30 August 2017

रोबोट : मात्र मील का पत्थर !

आज फेसबुक पर आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस पर एक विडियो स्ट्रीमिंग देख हैरत में आ गया । यह विडियो भविष्य में रोबोट तकनीकी के विकास और उसके इस्तेमाल से सम्बंधित था । आश्चर्य तब हुआ जब अंत में यह दिखाई पडा कि 120 वर्षों में रोबोट-गिरी के चलते बेरोजगारी चरम सीमा पर पहुँच जायेगी और शायद सभी बेरोजगार हो जाएँ । ऐसी अफवाह तब भी फ़ैली थी जब कंप्यूटर का प्रसार-प्रचार हो रहा था ।
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विडियो में दिखाया गया है कि आने वाले 120 वर्ष में रोबोटिक इतना विकसित हो चुका होगा की मनुष्य को कोई कार्य करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी । शायद रोबोट मनुष्य पर हुकूमत भी चलाने लग जाए । आज के दिन अमेरिका और रूस रोबोट की लड़ने वाली फ़ौज बना रहे है जो जल-थल-वायु तीनो में अपनी ताकत से चकित और काफी आबादी को लाचार कर सकता है । चिकित्सा और अन्वेषण के क्षेत्र में तो हमलोग रोबोट की सहायता लेने ही लगे है ।
सुधिजन संभवतः रोजगार का सीमित अर्थ लगा बैठे हैं – काम के बदले पैसा - वह भी नौकरी-पेशे से सम्बंधित । आज से हजार वर्ष पहले भी और आज भी ऐसे रोजगारयाफ्ता आबादी का 10-15 % ही रहे हैं । स्वरोजगारी  और किसान की संख्या सभी देशों में काफी है । बेरोजगारी की बात हम तब कर रहे है जब इस पृथ्वी पर जितना कार्य इस समय दिख रहा है उसका 1% भी नहीं हो रहा है । कुछ तो हाथ में गिनाये जा सकते हैं और जिसमें कुछ में सफलता हासिल करने में ही सैकड़ों वर्ष लग जायेंगे- जैसे
·         गरीबी : विश्व की 80% आबादी गरीब हैं ।
·         सागर : 95% क्षेत्र का अन्वेषण बाकी है ।
·         पर्यावरण : अगले 120 वर्ष में बढ़ता तापमान और घटता ओजोन मात्र रोबोट को रास आयेगा ।
·         शिक्षा : विश्व की 26% जनसंख्या अभी भी अशिक्षित है ।
·         घर : लगभग १० करोड़ बेघर हैं और १६० करोड़ झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं ।

ऐसी सैकंडों समस्याएं और संभावनाएं हैं जिनके निदान में मानव-रोजगार की अटूट आवश्यकता है क्योंकि रोबोट को मानव जितना संवेदनशील बनने की संभावना कम ही दिखती है ।
संभवतः यह मात्र कपोल कल्पना ही हो की मानव अपने मस्तिष्क का मात्र 10% ही प्रयोग कर पाता है । यह सत्य है की आइंस्टीन जिन्हें जीनियस माना जाता है उनका मस्तिष्क आम मानव से 15% बड़ा था । इससे यह तो विदित होता ही है की हमलोग अवश्य मानते हैं की हमें अपने मस्तिष्क का पूरा 100% प्रयोग कर बहुत कुछ हासिल करना है । सर्वगुणसंपन्न भावी रोबोट भी हमारी 10% सक्रीय मस्तिष्क की देन है । कितनी अचम्भे की बात है की रोबोट मशीन जिसे मानव ने मानव के लिए बनाया है वह उस प्राकृतिक मानव पर हावी हो जाएगा जिसे प्रकृति ने प्रकृति के लिए बनाया है । रोबोट मानव सभ्यता के भविष्य का मात्र एक मील का पत्थर हो सकता है, मानव का मालिक नहीं । 
मानव अपनी कार्य दक्षता और ताकत बढाने के लिए सदियों से अस्त्र-शस्त्र, यंत्र-मन्त्र की सहायता लेता रहा है. पत्थर और गुलेल के समय से बढ़ते-बढ़ते हमलोग लेज़रगन और एटम बम की दुनिया से बहुत आगे बढ़ गए हैं,  
21वी सदी के अंत तक हमलोग STD बूथ पर लाइन लगाते थे आज घर बैठे विडियो पर बातें करते हैं । आज का स्मार्टफ़ोन कल अवश्य पुराना पड़ जाएगा । आज भारत जैसे देश में भी लगभग सभी के पास मोबाइल या स्मार्ट फ़ोन है । दस वर्ष पहले मात्र एक करोड़ हवाई यात्रा करते थे  । आज यह संख्या 10 करोड़ पार कर गयी है । कल नौकरीपेशे वाले आठ घंटे काम करके घर लौट आते थे । आज 16 घंटे आम बात हो गयी है । आज स्त्री-पुरुष मिलकर कमाते हैं फिर भी कमी खटकती ही है । आज 70-75 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक भी घर-बाहर या ऑनलाइन इन्टरनेट पर काम करता दिखेगा । अब न तो शाम की गोष्ठी दिखती है और न हुक्का-पानी । हाँ, “Made for Each Other”  के स्वप्न में खोये व्यक्ति के लिए सही रोजगार मिलने में देर भी है और अंधेर भी ।
मानव अपनी परिभाषा खो देगा अगर वह कर्मयोगी न रहा तो । स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर से लेकर रोबोट तक सभी उपकरण मानव की सुविधा के लिए बने हैं । जो कार्य दिख रहा है और जो दिखेगा उसके लिए ये सभी साधन अभी भी बहुत अपर्याप्त है लेकिन समयोपयोगी हैं । अभी तो मानव को पृथ्वी को पृथ्वी बनाना है - उत्कृष्ट बनाना है । उसके बाद कई दूसरे ग्रहों से मित्रता करनी है । अभी तो असंख्य सूर्य, अनगिनत तारे, कोटि-कोटि आकाश गंगाएं,अरबों ब्रह्माण्ड के बारे में जानना, समझना और संपर्क बनाए रखना बाकी है । और यह सब बिना नौकरी-पेशे और रोजगार के असंभव है ।
अभी जब मात्र 10% मस्तिष्क सर्वगुणसंपन्न रोबोट का निर्माण कर सकता है तो 100% मष्तिष्क का उपयोग तो मानव को सर्वशक्तिमान, सर्वभूत, सर्वज्ञ बना देगा- वह बना देगा जो निरंतर का कर्मयोगी है ।

मेरी तकनीकी-ज्ञानशक्ति यह भान करा रही है की आज से 120 वर्ष बाद धरती के मुश्किल कार्यों के लिए और अरबों प्रकाश वर्ष(1 light year=9 trillion Km) दूर के संधान के लिए मानव शारीरिक रूप में स्वयम नहीं शामिल होगा. यह सभी कार्य अतिसक्षम स्मार्ट रोबोट करेंगे. हमारी फोर डायमेंशनल मौजूदगी भर रहेगी. यह उपस्थिति क्वांटम टेलीपोर्टेशन(quantum teleportation) संभव करेगा. साथ ही हमलोगों को रोबोट को नियंत्रण में रखने की प्रणाली सुदढ़ करनी होगी जैसे लॉकिंग सिस्टम, पासवर्ड, गेट इत्यादि वह भी मानव हैकर्स को ध्यान में रखकर.
धरती की उम्रसीमा अरबों वर्ष है उसमें कुछ हजार मानव-वर्ष ही बीते हैं. यह मानव सभ्यता के आरंभिक क्षण हैं. 



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Tuesday, 15 August 2017

तिरंगा

बहुत वर्षों बाद , आज पुनः बच्चों को तिरंगा फहराते देखा । गौर करने पर बहुत सारे कारण याद आते हैं जिनके चलते राष्ट्रीय तिरंगा अपने भारतवर्ष में ही अजनबी बन गया । कोई शक नहीं आजादी मिलने के कुछ वर्षों तक तिरंगे की धूम रही होगी । 15 अगस्त 1955 के कुछ दिन पहले पटना के बी०एन०कॉलेज के 9 छात्र पुलिस फायरिंग में मारे गए थे । उससे आक्रोशित होकर स्वतंत्रता दिवस को किसी ने तिरंगे के बगल में काला झंडा लगा दिया था । लोगों ने शहीद हुए युवको का अपार दुःख होते हुए भी काला झन्डा फाड़ कर फेंक दिया था । 26 जनवरी और 15 अगस्त को मेरे घर पर तिरंगा फहराने की प्रथा 2000 तक पिताजी के स्वस्थ्य रहने तक कायम रही । इस प्रथा को लुप्त करने में हमारी पीढ़ी को पूर्णतः दोष दिया जा सकता है ।

मुझमें तिरंगे से बेरुखी का दोष कैसे पनपा बताना आवश्यक है । एक कारण तो साफ़ दिखता है  मैं इस तिरंगे को हर उन वाहनों पर देखता था जो ज्यादातर भ्रष्टता से लिप्त थे । तिरंगे के साथ-साथरगीन बत्तियांकमांडो एस्कॉर्ट्सवाहनों के काफिले से होने वाली यातायात असुविधा की बढती बाढ़ ने मुझे और भी तिरंगे से दूर कर दिया ।  साथ ही सब नेताओं के सर से गाँधी टोपी भी गायब हो गयी । शायद इन्हें भी शर्म आती होगी या फिर खूबसूरती में कमी होने का भय होगा महात्मा गाँधी, जिन्हें टॉलस्टॉय, आइंस्टीन, मार्टिन लूथर और आज भी मंडेला और ओबामा अपना आइकॉन मानते हैं , उस गाँधी और उनके स्मृति चिन्ह गाँधी टोपी को आज के नेताओं ने बड़ी उदासीनता से भुला दिया ।
इस लुप्तप्रायः तिरंगे और टोपी को गायब कर बेईमानी और भ्रष्टाचार ने भरपूर जगह बना ली है  भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है । सबसे ज्यादा दोषी सरकारी नौकरी-याफ्ता हैं । तिरंगा मात्र सरकारी भवनों की शोभा बढाता है । अब तो कुछ समुदाय और राजनीतिक पार्टियां भी तिरंगे का अपमान करने लगी हैं ।
आज जब मैंने कुछ बच्चों को तिरंगा फहरा कर जन-मन गाते और सलामी देते देखा तो मैंने अपने छोटे भाई के साथ प्रण किया की इस देशभक्ति उजागर करने वाले उत्सव को पुनः बहाल करने का प्रयत्न करूंगा- लोगों के मध्य सन्देश फैला कर और प्रधान मंत्री जैसे विश्वसनीय पोर्टल पर आग्रह कर । तिरंगा भारतीय पहचान का आधार कार्ड से भी ज्यादा शक्तिशाली बायोमेट्रिक होगा ऐसा मेरा विश्वास है ।  
इस दिशा में मेरा प्रयास सतत है  मैं जहां कहीं भी लोगों के साथ उठता-बैठता हूँ तिरंगे के प्रति  सुधिजन को  जागरूक करने का प्रयत्न करता हूँ । 

समय-समय पर सोशल मीडिया पर ब्लॉग के जरिये विचारों का आदान-प्रदान भी करता रहता हूँ  साथ ही ट्वीट भी करता रहता हूँ  मैंने "मेरी सरकार " पोर्टल के माध्यम से प्रधान मंत्री जी से भी प्रार्थना की है  ऐसे ही सबको कोशिश करनी चाहिए  बूँद-बूँद कर भी घड़ा भरा जा सकता है   आशा है वर्ष २०१८ के स्वाधीनता दिवस पर देशप्रेम प्रदर्शित करने के इस  अवसर का भारतीय नागरिक  भरपूर उपयोग कर गर्वान्वित होंगे 






Saturday, 5 August 2017

चोरी चोरी

बचपन की दुनिया खेलों की दुनिया थी । सोते-जागते बस एक ही बात उकसाती रहती थी और वह था दोस्तों के साथ मस्ती करना । कोई भी सुना या जाना हुआ खेल अछूता नहीं रहता था । कोना-कोनी, रूमाल चोर, चोर-सिपाही, आस-पास, पिट्टो, बम-बाल, लट्टू, इक्कट-दुक्कट, डोल-पात, कुछ ऐसे खेल थे जिन्होंने कब बचपन की दुनिया आँखों से ओझल कर दी मालूम ही नहीं पड़ा ।
बचपन और किशोरावस्था के बीच एक जोखिम भरा अंतराल था, शरारत से भर-पूर जहां “इग्नोरेंस इस ब्लिस” की हवा बहती थी । ऊँचे-ऊँचे पेड़ों पर चढ़ना, मुश्किल जगहों से फल चोरी करना, नदी-तालाब में बिना तैरना जाने छलांग लगा देना, भुतहे कहे जाने वाले धुप अँधेरे कमरे में चले जाना, और अपने से बड़ों और मजबूत कद-काठी लोगों से पंगा लेना आम बात होती थी ।

पिछवाड़े की गली से जब कभी स्कूल के लिए शोर्टकट लगाते तब राय महाशय के सात-आठ फीट ऊँची दीवार पर नुकीले शीशों से ढकी मुंडेर से झांकते कच्चे आम के टिकोरे बरबस ठहरने को और ललचाने को मजबूर कर देते । एक दोपहर , स्कूल से साथियों के साथ लौटते समय चढाई की योजना बन ही गयी । सबसे भारी-भरकम साथी के कंधे पर सवार होकर, नुकीले शीशे को मोटे बोरे से निरस्त्र कर, खूब सारा टिकोरा तोड़ भाग लिए । उसी दिन देखा की उनके बगीचे में अमरुद के पेड़ पर भी काफी कच्चे अमरुद लगे थे । एक दोपहरी हमलोगों का पूरा झुण्ड उसी तरह उनके बगीचे में उतर आया । एक डाल से दूसरे डाल, एक पेड़ से दूसरे पेड़ , दीवार के पास के सभी पेड़ों को खाने लायक अमरूदों से अनाथ कर, मात्र 5 मिनटों में हमलोग चलते बने । दूसरे दिन मेरे घर राय आंटी धमक गयी । उन्होंने मुझे बुलवाया । प्यार से सर सहलाया । शायद चूमा भी । मेरी माँ के सामने उन्होंने अमरुद और पके केले से भरा थैला मेरे सामने रख दिया और कहा-“ सब मिल बैठ के खाना ।हम और हमारा मिस्टर अकेले रहता है । कोई और नहीं है । जब भी मन करे हमारा बाड़ी आगे से आना और जितना चाहे अमरुद तोड़ना । मौसम में आम और लीची भी होता है ।” उन्होंने अमरुद की चोरी वाला काण्ड माँ को एकदम नहीं बताया ।
उसके बाद हमलोगों ने कभी भी उनके घर का रास्ता नहीं लिया ।शायद लज्जा आती हो या फिर एक दूसरा एडवेंचर राजेंद्र नगर आम बगान एन नजर आने लगा था । तब बात समझ में नहीं आयी थी , अब 60 वर्ष बाद समझ में आ गयी है । 

इस बरसात मेरे घर के पीछे वाली दीवाल से सटे हुए अमरुद के पेड़ पर ढेर सारे अमरुद लगे थे । घर के आउट हाउस में रहने वाले परिवारों के बच्चे स्कूल से लौटने के बाद पहला इंटरव्यू उन्ही दो अमरुद के पेड़ों का लेते ।एक दोपहरी मैंने देखा की उनमें सबसे छोटा 4 वर्ष का लड़का भी पेड़ पर चढ़ा हुआ था । वह गिर कर चोटिल भी हो सकता था । मुझे देखते ही सब फुर्र हो गए । उनलोगों को मैंने बाकायदा सीढ़ी चढ़ कर पेड़ तक जाने की इजाजत दे दी । एक-दो बार वे गए भी । उसके बाद न तो वे चोरी से अमरुद तोड़ते और न तो सीढ़ी से चढ़कर मेरी जानकारी में । उनलोगों की उदासीनता मुझे खलने लगी । डाल पर पककर अमरुद गिर रहे थे । शाम को मैंने देखा पूरा एक झुण्ड अमरुद की चोरी कर रहा था । ये झुण्ड तोतों का था । मैंने उनका नजदीक से स्नेप लेना चाहा । उनका शोर देखने और सुनाने लायक था । ऐसा लगता था की मैंने उनके क्षेत्र में सेंध मारने की कोशिश की हो ।
तभी बरबस मुझे मार्क ट्वेन के लिखी “एडवेंचरस ऑफ़ टॉम सॉयर” की याद हो आयी । उस किताब का सार ही था - जो मजा चोरी करके खाने में है... जितना जोखिम उतना मजा ...

  

Friday, 4 August 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता !

हम सभी वरिष्ठ नागरिक अपनी उम्र और स्वास्थ्य से ताल मिलाते हुए 3 से 8 किलोमीटर की सुबह की सैर के बाद कोई 7 बजे सोसाइटी के पार्क की बेंच पर बैठ थोड़ी गप-शप लड़ाने के लिए जुट जाते हैं । एक ग्रुप अवकाश प्राप्त पुलिस अधिकारियों का है और दूसरा मिला-जुला इंजिनियर-डॉक्टर और सिविल सर्विस का है । पहला ग्रुप 6-7 jजन का है और ज्यादा मुखर है । नोटबंदी के बाद तो जैसे पूरी तरह मोदी शासन के विरूद्ध हो गया है । उन्हें वर्तमान शासन की कोई भी बात पसंद नहीं आती । इस पक्षपातपूर्ण रवैये से बाकि उपस्थिति परेशान हो जाती है खासकर युवा वर्ग जो बेंच के सामने बने जॉगिंग ट्रैक पर प्राणायाम, योग और व्यायाम करते रहते हैं । मैं इन हंसों के बीच कौआ हूँ, कभी-कभी ही इस पार्क में आना होता है 
आज पुनः मोदी विरोधी वार्ता लम्बी खीच रही थी । डॉक्टर ने टॉपिक बदलने के लिए कहा तो बात चीन-भारत दोक्लाम सीमा विवाद पर आ गयी । पुलिस ग्रुप में से एक ने कहा की भारत में कहाँ दम है चीन से लड़ने का । भारत बात ही बनाता रहता है और चीन का बनाया सामान पूरी दुनिया में फ़ैल गया है । भारत-चीन सीमा पर चीन ने सड़कों की घेराबंदी कर रखी है । चीन तो अब अपनी विशाल दीवाल के नीचे सबसे लाबी मेट्रो ट्रैक की सुरंग बना रहा है । हमलोग चुपचाप चीन चालीसा सुन रहे थे और उन्हें भुगत रहे थे । सामने व्यायाम करते एक किशोर भी सुन रहा था । उससे रहा न गया ।
उस किशोर ने मुस्कुरा कर कहा –“ अंकल ! हमारे भारत में बोलने की आजादी है चीन में बोलने पर पूरी पाबंदी । समय की बर्बादी तो उनकी सोच के भी परे है ।चीन में 80 वर्ष से ऊपर के लोग भी योगदान करते दिखेंगे  खैर मनाईये आप चीनी नहीं है । चीनी होकर चीन के किसी पार्क में बैठ भारत की बडाई कर रहे होते तो अबतक आपको जेल में डाल दिया जाता । वहाँ कम्युनिस्ट शासन है । हमारा गणतंत्र भारत इतनी बड़ी आबादी के साथ, विविधता के साथ उन्नति कर रहा है जिसे पूरा विश्व आदर से देख रहा है ।
सबसे मुखर चौधरी जी को यह वाचालता अप्रिय लगी, साथ ही उनके अहम को आघात । उन्होंने कहा की इस उम्र में तो अब परिचर्चा ही मनोरंजन का साधन है नहीं तो तुम्हारी पीढ़ी कब घास डालती है ? इसका जवाब एक दूसरे युवक के पास था  । उसने आदर के साथ कहा–“अंकल ! बच्चों का साथ कीजिये । उन्हें पढ़ाइये, अच्छी बातें सिखाईये, हमलोगों से बेहतर इंसान बनाईये । हमलोगों को भी शामिल कीजिये 
कितना कुछ छिपा था इन वचनों में ! सत्य में भारत महानता की तरफ बढ़ता जा रहा है । हो भी क्यों नहीं जिस देश की 50% से अधिक की आबादी की उम्र 35 से कम हो और ऐसी समझ वाले किशोर हों ।
भविष्य में, पार्क कुछ रचनात्मक परिचर्चाओं का साक्षी बनेगा ऐसा विश्वास है ।


Wednesday, 19 July 2017

आधार है तो आसानी है

वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार हटाओ अभियान और जन लोकपाल आन्दोलन सभी को विचलित कर रहा था. अधिकांश बुद्धिजीवी यह महसूस करते थे की भ्रष्टाचार व् बेईमानी भारत वर्ष का कैंसर बन चुकी है और इसका निवारण असंभव सा है. तभी मुझे आधार कार्ड की विशिष्टता ने आकर्षित किया. इस 12 अंकों वाले पहचान कार्ड में बायोमेट्रिक और डेमोग्राफिक ऐसा मेल था जो प्रत्येक भारतीय को एक विशिष्ट पहचान देती थी. यह विश्व का पहला डिजिटल प्रयत्न था जिसमें महात्मा गाँधी के सत्याग्रह की गूँज थी. बहुतेरी अनियमितताये स्वत ख़त्म होती दिखती थी, आधार कार्डधारी की पारदर्शिता और ईमानदारी में बहुत जल्द निखार आता दिख रहा था. दिसम्बर 2011 में मैंने आधार कार्ड बनवा लिया.

इसके दूसरे चरण को भी मैंने जल्द ही पंजीकृत करा लिया जैसे बैंक, गैस वितरण, पैन कार्ड वगैरह से लिंकिंग. गैस की सब्सिडी समय पर मेरे बैंक खाते में जाने लगी. आनंद तब आया जब स्मार्ट फोन के सिम के लिए मात्र आधार कार्ड ने पहचान पत्र और फोटो की आवश्यकता समाप्त कर दी. ऑनलाइन इनकम टैक्स रिटर्न भरने के बाद ITR-V फॉर्म की औपचारिकता भी आधार कार्ड से लिंक कर ऑनलाइन पूरी कर डाकघर के चक्कर से छुटकारा दिला दिया. 

मेरे जैसे वरिष्ठ नागरिक के लिए आधार कार्ड वरदान बनकर अवतरित हुआ है. आधार कार्ड निरंतर विकसित होकर सत्याग्रह का हस्ताक्षर बनेगा ऐसा मेरा विश्वास है. कोई आश्चर्य नहीं कि सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ते कदम आधार कार्ड को निकट भविष्य में प्रत्येक भारतीय नागरिक के आत्म-विवरण-जैसे शैक्षणिक योग्यता, व्यावसायिक अनुभव इत्यादि का समावेश कर कागजी घोड़ों की दौड़ से पूर्णरूपेण आज़ादी दिला दे.  

लेखक : प्रकाश नारायण सिंह


Sunday, 2 July 2017

ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ....

जिन्हें चाह होती है उन्हें गुरु राह चलते भी मिल जाते हैं । कुछ महीने पहले मुझे ज्ञात हुआ की घर से थोड़ी दूर ही  अच्छी लूज़ चाय ठीक भाव में मिलती है । दुकान पौ फटते ही खुल जाती है । अगला संयोग बनते ही सुबह की सैर से लौटते वक्त उस दुकान को खोजते पहुँच गया । देखा एक 75 वर्षीय वृद्ध छोटी सी दुकान संचालित कर रहे थे । उस समय किसी के लिए चाय तौल रहे थे । शेल्फ पर विभिन्न चाय पत्तियो के साथ बहुतेरे ड्राई फ्रूट्स के जार भी रखे हुए थे ।
मैंने चाय तो खरीदी ही साथ में उनके बारे में जानकारी भी ली । पत्नी के स्वर्गवासी होते ही नौकरीयाफ्ता इंजिनियर/डॉक्टर बेटों के साथ न रहकर इसी छोटी सी दुकान को अपना बसेरा बना लिया । काउंटर के बीच में बची जगह में स्टोव पर अपना भोजन बना लेते और वही दोपहर की झपकी और रात को सोने का बिस्तर बिछा लेते । नित्य कर्म के लिए वह बगल के सुलभ शौचालय का उपयोग करते । सामने सड़क की चहल-पहल की रोचकता के अलावे खाली समय का सदुपयोग किताबों और अखबार में व्यस्त रहकर करते हैं ।
तीसरे संयोंग में मैंने उन्हें रंग और सुगंध के मिश्रण वाली वह चाय ब्लेंड करने को कहा जो उनके हिसाब से सबसे अच्छी हो । इस बार उनके रंग और सुगंध का एक विशिष्ट मेल से परिचय हुआ । मेरे ज्ञान में इस उम्र में कुछ और निखार आया । जो उन्होंने कहा वह इस प्रकार है ।
"बाबूसाहब, इसीको न सत्याग्रह कहते हैं  अगर आप स्वयम चाय बनाते होंगे तो मैं दोनों तरह की पत्ती अलग-अलग दूंगा पहले पूरा रंग आने तक उबाल लीजिये और तब सुगंध वाली चायपत्ती डालकर, ढंककर 3 मिनट के लिए छोड़ दीजिये । स्वाद अनुसार चीनी और दूध डालकर पीने लायक गरमा लीजिये । अगर जो आपकी पत्नी बनाती होगी तो मैं दोनों चाय को ब्लेंड कर देता हूँ । थोड़ा कम महक होगी पर सामने परोसी चाय के कप का आनन्द ही कुछ और है । मुस्कुराते हुए कहा औरतों को इतना काम रहता है कि एक-दो दिन तो चाय तरीके से बनेगी और उसके बाद चाय का बेशुमार स्वाद मिलने लगेगा । हाँ अगर बहू बंगाल की हो तो चाय आपकी कल्पना से भी बेहतर बना लेगी. तब शायद आपको रोजाना माछेरझोल की भी आदत डालनी होगी ।
पत्नी का पढ़ा-लिखा शहरी होना या अनपढ़ गंवार होना आपकी आशाओं पर निखार् लाने या पानी उड़ेलने के लिए ज्यादा मायने नहीं रखता । इसके लिए आपको और आपकी पत्नी को आवश्यकतानुसार समझदार और दुनियादार होना होगा । समझदार मतलब एक दूसरे की समझना बहुत जरूरी है । दुनियादारी माने अलग-अलग प्रकृति वालों से ताल मिलाना , ताड़ कर व्यवहार करना ।
व्यर्थ में जनमानस तुलसीदास के दोहे ढोल गंवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारीका मतलब क्रोध करना, पीटना इत्यादि लगा लेते हैं । भला तुलसीदास जैसे विद्वान ऐसा क्यों कहेंगे । ताड़ना का पहला अर्थ होता है समझना, ताल मिलाना । ढोल को क्रोध से पीटेंगे तब वह तो फट जाएगा । गंवार को शांति और धेर्य से समझाना होता है । शुद्र थोड़े मान की आशा तो करेगा ही । पशु से स्नेह कीजियेगा तो वह जान तक दे देगा । पत्नी को भी प्यार से उसी के संस्कारों और समझ को नजर में रखते हुए ताल बिठाने से जीवन बेपटरी नहीं होगी । पुरुष पहल करे और सदैव ध्यान में रखे तो बेहतर ।"
जाते-जाते मैंने सिंह जी पूछ ही लिया की यहाँ ठौर बनाने की कोई ख़ास वजह । मुस्कुरा कर उन्होंने कहा की उन्हें अपने बच्चों या बहुओं से कोई शिकायत नहीं है । वे समय-समय पर उनके पास जाते रहते हैं । उनकी अंतरात्मा ने कहा वैसा ही किया । इस उम्र में समझौते के जीवन से ऐसी स्वतंत्रता श्रेयस्कर लगती है । दूरियां संबंधों को मधुर रखती हैं ।
सिंह जी ने उपर्युक्त दोहे का विस्तार से अर्थ समझने के लिए एक  इन्टरनेट लिंक बताया उसमें मुझे विस्तार से पढने को मिल गया. रामचरित के और भी बहुत से आख्यान अभी तक मैं समझ नहीं पाया हूँ. जैसे बाली-वध, केकई-चरित्र, शुप्रनखा प्रकरण इत्यादि. ये सब भी समझना होगा 








Saturday, 25 February 2017

परिचय

कल , सुबह की सैर के बाद मैं अपने प्रिय पार्क की बेंच पर कुछ नैसर्गिक समय बिताने बैठ गया. आजकल रस्ते से एक अखबार भी उठा लेता हूँ. हेडलाइंस देखने तक ब्रीथिंग नार्मल हो जाती है. उसके बाद 10 मिनट प्राणायाम और उतने ही देर व्यायाम. बसंत के आगमन के साथ सुबह बड़ी सुहावनी होती जा रही है. आज कुछ ज्यादा ही लोग थे पार्क में. दो जन मेरे बेंच पर भी आकर बैठ गए. कुल छ महानुभावो की टोली थी. अपनी बातों में उनलोगों ने मुझे भी शरीक कर लिया गोकि आँख मिचौली कुछ दिनों से संघोष्टि में शामिल करने के लिए चल रही थी. सभी सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त आईएस और आईपीएस अधिकारी थे . एक प्रोफेसर भी थे.

प्रोफेसर मेरी बगल में बैठे थे. सिलसिला उन्होंने शुरू किया. पार्क में काफी मात्रा में प्लास्टिक की खाली बोतलें और नमकीन के रैपर्स बिखरे पड़े थे. उनका कहना सही भी था. अँधेरा होते ही पार्क में मनचले लड़कों का जमावड़ा हो जाता है. उनकी कारीगरी बिखरे फैले कचरे से बखूबी हो जाती है. लगता था कि सोसाइटी का पार्क प्रशासन इस गन्दगी से बेखबर था.

आज मेरा उस टोली से पहला सामना था. जाहिर है मैं कुछ बेहतर हल देकर स्वयम को साबित करना मुनासिब समझ रहा था. वे लोग भी मेरी प्रतिक्रिया आंकने को बेताब दिख रहे थे. मेरा पर्यावरण मैनेजमेंट का अनुभव उकसाने लगा. मैंने सुझाया कि ये मसला तो आनन-फानन में दुरुस्त किया जा सकता है. हम सात जन पार्क के एक सिरे से शुरू करते है और कचरा चुनते हुए एक बैग में रखते हुए दूसरे किनारे तक पहुँच जायेंगे. सभी महाशय सन्नाटे में आ गए. मैंने इस प्रक्रिया को सेहतमंद भी बताया. सभी जन 20-25 बार झुकेंगे और 100 मीटर चलेंगे. सेहत पर अच्छा असर पड़ेगा. मैंने यह भी बताया कि ऐसा मैंने पूना में बुजुर्गों को बायोडाइवर्सिटी पार्क, पाषाण में नियमित रूप से करते देखा है.

उनमें से किसी को भी यह परामर्श नहीं भाया. लोग तरह-तरह के बहाने बनाने लग गए. सोसाइटी टैक्स लेती है, कचरा छूने से बीमारी होने का खतरा रहेगा, वगैरह. फिर बात सड़क पर बेबाक थूकने से लेकर ट्रेन में मनचले लड़कों की आवारगी और बत्तमीजी पर होने लगी , उसके बाद लालू के चलते प्रांत की जगहंसाई और उसके बाद धोनी के चलते मिली प्रतिष्ठा पर चर्चा होने लगी.

आज मैं 15 मिनट ज्यादा ही रुक गया था. नमस्कार कर घर की ओर चला. पार्क से बाहर निकलते ही पार्क का केयरटेकर दिख गया. मेरा गुड मोर्निंग उसे बहुत भला लगा. मैंने पार्क की ज्वलंत समस्या बतायी. उसने पार्क की त्वरित सफाई का गर्मजोशी के साथ आश्वासन दिया.

आज सुबह मैं थोड़ी जल्दी पहुँच गया. पार्क से सब कचरा ही नहीं साफ़ किया गया था बल्कि जंगली घास और झाड भी हटा दिए गए थे साथ ही जॉगिंग ट्रैक जगमग कर रहा था. मैं टोली के सदस्यों के आने से पहले ही पार्क से बाहर निकल थोड़ी दूर पूरब के छोटे पार्क में कुछ बेहतर समय बिताने बढ़ गया.





Friday, 24 February 2017

अखबार वाले

तकरीबन २५ साल पहले अखबार घर-घर पहुचाने का काम 30-40 वर्ष के व्यस्क किया करते थे. बाजार और प्रेस के पास किशोर लड़के “आज की ताजा खबर” चिल्लाते अखबार बेचते नजर आते थे. पर अब बहुत कुछ बदल गया है. दिवंगत राष्ट्रपति माननीय अबुल कलाम का जीवन चरित इसका मुख्य कारण है. अब ज्यादातर किशोर साइकिल पर फेरी लगाते दीखते हैं. बहुतों के कान में ईयरफोन भी लगा रहता है. रोमांच तो तब आता है जब वे तीसरी और चौथी मंजील की सिमटी बालकनी में अखबार का बण्डल फेंकते नजर आते हैं. बिलकुल सटीक. अखबार का फेरी लगाने का कार्य सूर्योदय की आसपास समाप्त हो जाता है. इससे उन्हें रोजाना 100-200 रुपये की आमदनी हो जाती है.
जैसा मेरे अशोकनगर, रांची की कॉलोनी में होता है वैसा देश के हरेक कोने में होता ही होगा. सुबह की सैर के बाद जब मैं पार्क में आकर बैठता हूँ तो वही फेरी लगाने वाले किशोर क्रिकेट खेलते नजर आते हैं. क्रिकेट का बैट और विकेट उनके साइकिल के डंडे पर बंधा रहता है. जाहिर है सुबह की साइकिल पर मशक्कत उनके शरीर पर पूरी निखरी नजर आती है और क्रिकेट के खेल में भी. केवल चौओं और छक्कों की बरसात देखने को मिलती है. टेनिस बाल से 60-70 मीटर लम्बी दूरी पार करना कमाल की बात है. बोलिंग में भी काफी तेज रवानगी होती है. मैदान ढंग का नहीं है इसलिए उन्हें मैंने भागते बाल को पकड़ने के लिए डाइविंग और स्लाइडिंग करते नहीं देखा.
आज मैं लॉन्ग-ऑन पोजीशन पर लगे बेंच पर बैठा था. खेल ख़त्म हुआ. मेरी बगल में एक लड़के की साइकिल लगी हुई थी. लौटने के पहले वह सुस्ताने और अपने जैकेट पहनने मेरी बगल में बैठ गया. मैंने जिज्ञासावश पूछा कि अब इसके बाद तुम्हारी क्या रूटीन होगी. उसने कहा कि वह बिजली बोर्ड में दिहाड़ी पर ट्रांसफॉर्मर वाइंडिंग का काम करता है रोजाना 300 रुपये पर. मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसके सब साथी किसी न किसी प्रयोजन में लगे हैं. कोई कॉलेज में पढ़ रहा है, कोई डिप्लोमा कर रहा है. कोई दुकान पर अपने पिता का हाथ बता रहा है, कुछ ऑटोरिक्शा चलाते हैं  और वह लाल टी-शर्ट वाला लम्बू ग्रेजुएशन के बाद कंप्यूटर ट्रेनिंग भी देता है.
अगर ऐसा ही पूरे देश में हो रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं कि भारत अगले कुछ वर्षों में दुनिया का अग्रणी बन जाए.

हम कल क्या थे हम आज हैं क्या ....



डिफेन्स काउंसल दीपक सहगल(अमिताभ बच्चन)ने “पिंक” फिल्म में कुछ अहम् प्रश्नों को जन्म दिया है.उन्होंने समाज के पिछड़ेपन पर कडा आघात किया है. भारत का संविधान नर-नारी में कोई विभेद नहीं रखता है. अगर अनपढ़, गवांर और कट्टरवादियों की बात न कर एक पढ़े-लिखे समझदार समाज की बात करें तब ये विसंगति बहुत शर्मनाक लगती है. महिलायें अगर देर से घर लौटती हैं, अगर घर से बाहर जाती हैं अथवा स्वतन्त्र रहना चाहती हैं तो हमारा कथित सभ्रांत समाज उन्हें बिगड़ी हुई या वैश्या की पंक्ति में ला खडा करता है. उन्हें तंग कपडे नहीं पहनने चाहिए. उन्हें शराब नहीं पीना चाहिए. उन्हें ठहाका नहीं लगाना चाहिए. उन्हें अश्लील मजाक नहीं शेयर करने चाहिए. पर इनमें से कोई भी बात पुरुष पर लागू नहीं होती. ऐसा तब जब कि अब तकरीबन प्रत्येक परिवार चाहता है कि उसके घर की औरतें और लडकिया लड़कों की तरह कमाऊ बने और साथ ही गृहस्थी भी चलावें.

हमारे धर्म ग्रन्थ,हमारी पौराणिक कथाये, रामायण और महाभारत ने पुरुषों से ज्यादा नारियों को सम्मान दिया है. देवताओं से ज्यादा देवियाँ हैं और पूजी जाती हैं. वीरांगनाएं भी कम नहीं हैं. ये सिलसिला आज तक चला आ रहा है. जब भी नारी को अपमानित किया गया उसका बहुत भयंकर परिणाम हुआ, चाहे वह सीता के साथ हुआ हो अथवा द्रौपदी के साथ हुआ हो.

हमलोगों की मानसिकता पर ये कीचड़ कब और कैसे लगा ? हमारे संस्कार में यह विकृति कहाँ  से आयी. बहुतेरे भारतीयों के डी०एन०ए० में यह विसंगति कैसे आरोपित हुई ? एक कारण तो शिक्षा की कमी लगती है.दूसरा विदेशी आक्रमण जिसका एकमात्र मकसद सर्वविदित है.पर सबसे बड़ा कारण है पुरुषों की नैतिक कमजोरी. वही पुरुष जो अपनी माँ-बहन-बेटियों के सम्मान पर आंच नहीं आने देता है, उसका नजरिया पराई नारियों के प्रति इतना वीभत्स हो जाता है.

आज हम विकसित देशों की ओर देखें. कुछ अपवादों को छोड़कर वहां नारी और पुरुष को समान अधिकार है. नारी शारीरिक रूप से निर्बल होती हैं. इन देशों में तो नारी को सबल बनाने के लिए बहुतेरे कायदे-कानून भी कड़ाई के साथ पालन किये जाते हैं.

आम्रपाली के बाद अब जाकर नारी के सम्मान और बराबरी की बातें निखर कर सामने आ रही हैं. भारत तो बहुत दिनों से मात्र  पुरुष आबादी के साथ आगे बढ़ रहा था. तो क्या भारत भी अब एक विकसित देश होने के बहुत करीब है जहां 100% प्रतिशत आबादी देश के विकास में अपना सहयोग देगी ? जहां “महिलायें प्रथम” और “साथ-साथ” ज्यादा दृष्टिगोचर होगा. कम से कम “पिंक” का समापन क्रेडिट गीत तो इसी की उद्घोषणा करता है.



तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की 
समय को भी तलाश है , समय को भी तलाश है 

जो तुझ से लिपटी बेड़ियाँ
समझ न इन को वस्त्र तू .. (x२) 
ये बेड़ियां पिघाल के 
बना ले इनको शस्त्र तू 
बना ले इनको शस्त्र तू 
तू खुद की खोज में निकल
समय को भी तलाश है , समय को भी तलाश है 

चरित्र जब पवित्र है
तो क्यों है ये दशा तेरी .. (x२) 
ये पापियों को हक़ नहीं
की ले परीक्षा तेरी 
की ले परीक्षा तेरी 
तू खुद की खोज में निकल 
तू किस लिए हताश है तू चल, तेरे वजूद की 
समय को भी तलाश है . समय को भी तलाश है 

जला के भस्म कर उसे
जो क्रूरता का जाल है .. (x२) 
तू आरती की लौ नहीं
तू क्रोध की मशाल है 
तू क्रोध की मशाल है 
तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की 
समय को भी तलाश है. समय को भी तलाश है 

चूनर उड़ा के ध्वज बना
गगन भी कपकाएगा .. (x२) 
अगर तेरी चूनर गिरी
तोह एक भूकंप आएगा 
तोह एक भूकंप आएगा 
तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की 
समय को भी तलाश है , समय को भी तलाश है



गीतकार : तनवीर गाजी ; गायक: अमिताभ बच्चन