डिफेन्स काउंसल दीपक सहगल(अमिताभ बच्चन)ने “पिंक” फिल्म में कुछ अहम् प्रश्नों को जन्म दिया है.उन्होंने समाज के पिछड़ेपन पर कडा आघात किया है. भारत का संविधान नर-नारी में कोई विभेद नहीं रखता है. अगर अनपढ़, गवांर और कट्टरवादियों की बात न कर एक पढ़े-लिखे समझदार समाज की बात करें तब ये विसंगति बहुत शर्मनाक लगती है. महिलायें अगर देर से घर लौटती हैं, अगर घर से बाहर जाती हैं अथवा स्वतन्त्र रहना चाहती हैं तो हमारा कथित सभ्रांत समाज उन्हें बिगड़ी हुई या वैश्या की पंक्ति में ला खडा करता है. उन्हें तंग कपडे नहीं पहनने चाहिए. उन्हें शराब नहीं पीना चाहिए. उन्हें ठहाका नहीं लगाना चाहिए. उन्हें अश्लील मजाक नहीं शेयर करने चाहिए. पर इनमें से कोई भी बात पुरुष पर लागू नहीं होती. ऐसा तब जब कि अब तकरीबन प्रत्येक परिवार चाहता है कि उसके घर की औरतें और लडकिया लड़कों की तरह कमाऊ बने और साथ ही गृहस्थी भी चलावें.
हमारे धर्म ग्रन्थ,हमारी पौराणिक कथाये, रामायण और महाभारत ने पुरुषों से ज्यादा नारियों को सम्मान दिया है. देवताओं से ज्यादा देवियाँ हैं और पूजी जाती हैं. वीरांगनाएं भी कम नहीं हैं. ये सिलसिला आज तक चला आ रहा है. जब भी नारी को अपमानित किया गया उसका बहुत भयंकर परिणाम हुआ, चाहे वह सीता के साथ हुआ हो अथवा द्रौपदी के साथ हुआ हो.
हमलोगों की मानसिकता पर ये कीचड़ कब और कैसे लगा ? हमारे संस्कार में यह विकृति कहाँ से आयी. बहुतेरे भारतीयों के डी०एन०ए० में यह विसंगति कैसे आरोपित हुई ? एक कारण तो शिक्षा की कमी लगती है.दूसरा विदेशी आक्रमण जिसका एकमात्र मकसद सर्वविदित है.पर सबसे बड़ा कारण है पुरुषों की नैतिक कमजोरी. वही पुरुष जो अपनी माँ-बहन-बेटियों के सम्मान पर आंच नहीं आने देता है, उसका नजरिया पराई नारियों के प्रति इतना वीभत्स हो जाता है.
आज हम विकसित देशों की ओर देखें. कुछ अपवादों को छोड़कर वहां नारी और पुरुष को समान अधिकार है. नारी शारीरिक रूप से निर्बल होती हैं. इन देशों में तो नारी को सबल बनाने के लिए बहुतेरे कायदे-कानून भी कड़ाई के साथ पालन किये जाते हैं.
आम्रपाली के बाद अब जाकर नारी के सम्मान और बराबरी की बातें निखर कर सामने आ रही हैं. भारत तो बहुत दिनों से मात्र पुरुष आबादी के साथ आगे बढ़ रहा था. तो क्या भारत भी अब एक विकसित देश होने के बहुत करीब है जहां 100% प्रतिशत आबादी देश के विकास में अपना सहयोग देगी ? जहां “महिलायें प्रथम” और “साथ-साथ” ज्यादा दृष्टिगोचर होगा. कम से कम “पिंक” का समापन क्रेडिट गीत तो इसी की उद्घोषणा करता है.
तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की
समय को भी तलाश है , समय को भी तलाश है
जो तुझ से लिपटी बेड़ियाँ
समझ न इन को वस्त्र तू .. (x२)
ये बेड़ियां पिघाल के
बना ले इनको शस्त्र तू
बना ले इनको शस्त्र तू
तू खुद की खोज में निकल
समय को भी तलाश है , समय को भी तलाश है
चरित्र जब पवित्र है
तो क्यों है ये दशा तेरी .. (x२)
ये पापियों को हक़ नहीं
की ले परीक्षा तेरी
की ले परीक्षा तेरी
तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश है तू चल, तेरे वजूद की
समय को भी तलाश है . समय को भी तलाश है
जला के भस्म कर उसे
जो क्रूरता का जाल है .. (x२)
तू आरती की लौ नहीं
तू क्रोध की मशाल है
तू क्रोध की मशाल है
तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की
समय को भी तलाश है. समय को भी तलाश है
चूनर उड़ा के ध्वज बना
गगन भी कपकाएगा .. (x२)
अगर तेरी चूनर गिरी
तोह एक भूकंप आएगा
तोह एक भूकंप आएगा
तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की
समय को भी तलाश है , समय को भी तलाश है
गीतकार : तनवीर गाजी ; गायक: अमिताभ बच्चन
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