१९६० के अक्टूबर माह में हमलोग झुमरी तिलैया के हाई स्कूल में मेट्रिक के सेंट-अप टेस्ट की तैयारी में लगे थे तभी क्लास में रामेश्वर प्रसाद बरनवाल का पदापर्ण हुआ. उन्हें मेट्रिक की बोर्ड परीक्षा पुनः देनी थी. आजकल जैसे धोनी के मैदान में आते ही धोनी-धोनी की चैंटिंग होती है वैसे ही पोपटलाल-पोपटलाल की चैंटिंग होने लगी. सोशल साइंस के अंतर्गत बागवानी का फील्ड-वर्क भी हुआ करता था. उसके लिए चार-चार लड़कों का ग्रुप बनाया जाता था. पोपट लाल मेरे ग्रुप में आ गए. मैं उन्हें भैया कहकर संबोधित करता था. बागवानी क्लास के दौरान ही समझ में आ गया की उन्हें पोपटलाल क्यों कहा जाता था. कुछ दिन पहले “जब प्यार किसी से होता है” फिल्म आई थी जिसमें कॉमेडियन राजेंद्र नाथ का नाम पोपटलाल था. ये भी उसकी नक़ल करते थे. यहाँ तक की एक-दो कमउम्र लड़कों को छोड़ सभी फुलपैंट पहना करते थे. रामेश्वर जी सबसे बड़ा होने के बावजूद हाफपैंट पहनते थे.
रामेश्वर जी से अंतिम मुलाक़ात मेट्रिक परीक्षा के बाद मार्च महीने में हुई. वे पूर्णिमा सिनेमा हाल के मोड़ वाली दुकान पर पोस्टकार्ड पर पोस्टकार्ड लिखे जा रहे थे. उनकी आसानी के लिए पान दुकान के बाएं तरफ एक तख्ता भी लगाया हुआ था . मुझे बिमल राय की काबुलीवाला देखने की इजाजत मिली थी. मैं एक मीठा पान खाकर हाल में बैठने का इरादा रखता था. रामेश्वर जिनका मुंह हमेशा पान से रंगा रहता था ने मुझे पान खाने से एकदम मना कर दिया, कहा- “मेरे जैसी आदत लग जायेगी.”
आज जब
फेसबुक में मेरे छोटे भाई ने झुमरी तिलैया और रामेश्वर का जिक्र किया और मेरे
मित्र अशोक ने भी व्हाट्सएप पर उसी कहानी को दोहराया तो मैं भी इन्टरनेट खंगालने
लगा. रामेश्वर प्रसाद बरनवाल की अंतिम फोटो दिखाई पड़ी. चेहरे में बहुत ज्यादा
बदलाव नहीं आया था
