आज मैंने “मदारी” फिल्म देखी । अच्छी थी । इरफ़ान खान पर ऐसी कहानियां फब्ती हैं जिनमें बड़ी-बड़ी तीखी आँखों का खेल हो । कहानी बस यही कहने को बनी थी – “सरकार भ्रष्ट नहीं है, भ्रष्टाचार के लिए सरकार है” ।
मैंने ऐसा अनुभव किया है की जब भी इस तरह की सच्चाईओं का मीडिया में पर्दा फाश होने लगता है, लोग और ज्यादा निडर हो जाते हैं । ये बात अश्लीलता और फूहड़पने तक की ही नहीं है बल्कि सभी कुछ के लिए है । भ्रष्टाचार पर पहले भी कई सशक्त फ़िल्में बनी हैं । जागते रहो और श्रो 420 , 1950 के दशक की फ़िल्में थीं । तब भ्रष्टाचार की शुरुआत थी । आज के दिन ईमानदारी का जनाजा गली-सड़कों पर तमाशा बना हुआ है ।
अब अगर हम मान लें कि सरकार भ्रष्ट नहीं है, भ्रष्टाचार के लिए सरकार है तब बाकी क्या बचता है । ये जुमला किसी भी गलत बात के लिए बोला जा सकता है जैसे मनुष्य नंगा नहीं है, नग्नता मनुष्य के लिए बनी है । असत्य बोलने के लिए मनुष्य है, कमजोर को तकलीफ देने के लिए सक्षम हैं, गरीबों को सताने के लिए अमीर हैं वगैरह ।
तीन तयशुदा बातें हैं जो कुछ देशों को बहुत हद तक भ्रष्टाचार मुक्त बनाती हैं । न्यूजीलैंड, फ़िनलैंड, डेनमार्क और स्वीडन में भ्रष्टाचार के खिलाफ चौक-चौबंद कानून व्यवस्था के अलावे पारदर्शिता और जनता की भागेदारी पर अत्यंत बल दिया जाता है ।“Right to Information” बुनियादी है । इन देशों में साक्षरता शत-प्रतिशत है । और हाँ, आबादी बहुत कम है । नेताओं और सरकारी नौकरों के रहन-सहन पर पूरी नजर रखी जाती है । डेनमार्क में तो नेताओं को अपने पर किया गया खर्च, गिफ्ट, टूर इत्यादि का पूरा ब्यौरा देना पड़ता है ।
भारत देश में इसका ठीक उल्टा है । सबसे अमीर नेता लोग ही हैं । उनसे क़ानून भी डरता-सहमता है ।
भारत देश में आबादी और निरक्षरता आड़े आ जाती है फिर भी हम डेनमार्क जैसा कुछ शुरुआत तो कर ही सकते हैं जिससे भ्रष्टाचार की गति में कमी आने लगे जैसे:
- बजट की पूरी-पूरी जानकारी और उसके खर्च पर जनता की नजर ।
- सरकारी नौकरों और नेताओं के लिए एक सशक्त कोड ऑफ़ कंडक्ट जैसा डेनमार्क में है ।
- भ्रष्टाचार की पहचानी गति-विधियों पर कानूनी पकड़ ।
सरकार भ्रष्ट नहीं है, भ्रष्टाचार के लिए सरकार है तो फिर सरकार भी तो नागरिकों के द्वारा , नागरिकों के लिए , नागरिकों की है ।
