Sunday, 2 July 2017

ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ....

जिन्हें चाह होती है उन्हें गुरु राह चलते भी मिल जाते हैं । कुछ महीने पहले मुझे ज्ञात हुआ की घर से थोड़ी दूर ही  अच्छी लूज़ चाय ठीक भाव में मिलती है । दुकान पौ फटते ही खुल जाती है । अगला संयोग बनते ही सुबह की सैर से लौटते वक्त उस दुकान को खोजते पहुँच गया । देखा एक 75 वर्षीय वृद्ध छोटी सी दुकान संचालित कर रहे थे । उस समय किसी के लिए चाय तौल रहे थे । शेल्फ पर विभिन्न चाय पत्तियो के साथ बहुतेरे ड्राई फ्रूट्स के जार भी रखे हुए थे ।
मैंने चाय तो खरीदी ही साथ में उनके बारे में जानकारी भी ली । पत्नी के स्वर्गवासी होते ही नौकरीयाफ्ता इंजिनियर/डॉक्टर बेटों के साथ न रहकर इसी छोटी सी दुकान को अपना बसेरा बना लिया । काउंटर के बीच में बची जगह में स्टोव पर अपना भोजन बना लेते और वही दोपहर की झपकी और रात को सोने का बिस्तर बिछा लेते । नित्य कर्म के लिए वह बगल के सुलभ शौचालय का उपयोग करते । सामने सड़क की चहल-पहल की रोचकता के अलावे खाली समय का सदुपयोग किताबों और अखबार में व्यस्त रहकर करते हैं ।
तीसरे संयोंग में मैंने उन्हें रंग और सुगंध के मिश्रण वाली वह चाय ब्लेंड करने को कहा जो उनके हिसाब से सबसे अच्छी हो । इस बार उनके रंग और सुगंध का एक विशिष्ट मेल से परिचय हुआ । मेरे ज्ञान में इस उम्र में कुछ और निखार आया । जो उन्होंने कहा वह इस प्रकार है ।
"बाबूसाहब, इसीको न सत्याग्रह कहते हैं  अगर आप स्वयम चाय बनाते होंगे तो मैं दोनों तरह की पत्ती अलग-अलग दूंगा पहले पूरा रंग आने तक उबाल लीजिये और तब सुगंध वाली चायपत्ती डालकर, ढंककर 3 मिनट के लिए छोड़ दीजिये । स्वाद अनुसार चीनी और दूध डालकर पीने लायक गरमा लीजिये । अगर जो आपकी पत्नी बनाती होगी तो मैं दोनों चाय को ब्लेंड कर देता हूँ । थोड़ा कम महक होगी पर सामने परोसी चाय के कप का आनन्द ही कुछ और है । मुस्कुराते हुए कहा औरतों को इतना काम रहता है कि एक-दो दिन तो चाय तरीके से बनेगी और उसके बाद चाय का बेशुमार स्वाद मिलने लगेगा । हाँ अगर बहू बंगाल की हो तो चाय आपकी कल्पना से भी बेहतर बना लेगी. तब शायद आपको रोजाना माछेरझोल की भी आदत डालनी होगी ।
पत्नी का पढ़ा-लिखा शहरी होना या अनपढ़ गंवार होना आपकी आशाओं पर निखार् लाने या पानी उड़ेलने के लिए ज्यादा मायने नहीं रखता । इसके लिए आपको और आपकी पत्नी को आवश्यकतानुसार समझदार और दुनियादार होना होगा । समझदार मतलब एक दूसरे की समझना बहुत जरूरी है । दुनियादारी माने अलग-अलग प्रकृति वालों से ताल मिलाना , ताड़ कर व्यवहार करना ।
व्यर्थ में जनमानस तुलसीदास के दोहे ढोल गंवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारीका मतलब क्रोध करना, पीटना इत्यादि लगा लेते हैं । भला तुलसीदास जैसे विद्वान ऐसा क्यों कहेंगे । ताड़ना का पहला अर्थ होता है समझना, ताल मिलाना । ढोल को क्रोध से पीटेंगे तब वह तो फट जाएगा । गंवार को शांति और धेर्य से समझाना होता है । शुद्र थोड़े मान की आशा तो करेगा ही । पशु से स्नेह कीजियेगा तो वह जान तक दे देगा । पत्नी को भी प्यार से उसी के संस्कारों और समझ को नजर में रखते हुए ताल बिठाने से जीवन बेपटरी नहीं होगी । पुरुष पहल करे और सदैव ध्यान में रखे तो बेहतर ।"
जाते-जाते मैंने सिंह जी पूछ ही लिया की यहाँ ठौर बनाने की कोई ख़ास वजह । मुस्कुरा कर उन्होंने कहा की उन्हें अपने बच्चों या बहुओं से कोई शिकायत नहीं है । वे समय-समय पर उनके पास जाते रहते हैं । उनकी अंतरात्मा ने कहा वैसा ही किया । इस उम्र में समझौते के जीवन से ऐसी स्वतंत्रता श्रेयस्कर लगती है । दूरियां संबंधों को मधुर रखती हैं ।
सिंह जी ने उपर्युक्त दोहे का विस्तार से अर्थ समझने के लिए एक  इन्टरनेट लिंक बताया उसमें मुझे विस्तार से पढने को मिल गया. रामचरित के और भी बहुत से आख्यान अभी तक मैं समझ नहीं पाया हूँ. जैसे बाली-वध, केकई-चरित्र, शुप्रनखा प्रकरण इत्यादि. ये सब भी समझना होगा 








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