Sunday, 22 October 2017

भोग प्रसाद

बहुत वर्षों बाद बहुत दिनों से बागल बाबा मंदिर में प्रतिष्ठित काली माँ का दर्शन करने की इच्छा हो रही थी । 2003 में अवकाश प्राप्ति के बाद, जब किसी दूसरे कार्य के लिए कॉलोनी गया तो बेसमय मंदिर जाने पर कपाट बंद मिलते थे ।
दीवाली की शाम मेरे बेटे ने भी अगली सुबह जाकर खिचड़ी प्रसाद पाने की इच्छा बतायी। बचपन में यश अपने साथियों के साथ लाइन लगकर प्रसाद पाता था । बहुतेरे तो डोलचा भरकर प्रसाद घर ले जाते थे। तय हुआ सुबह 6 बजे कार से निकलने का । बेटे यश का अमेरिका से कोई रिसर्च प्रोजेक्ट का अर्जेंट काम आ गया । देर से  सोया । नींद नहीं खुली । पर प्रसाद तो 7 बजे तक खत्म हो जाता । मैंने उसे जगाना उचित नहीं समझा । ज्यादा देर हो जाती ।
मन्दिर कोई 5 km दूर था ।  तबीयत नासाज थी । रिमझिम बारिश हो रही थी । मैंने आधे दूर का रास्ता ऑटो से और बाकी पैदल तय किया।  बहुत कुछ बदल गया था । बच्चों की नयी खेप प्रसाद लेकर वापिस जा रही थी । बूढ़े पुजारी अब नही रहे थे । माँ काली की मूर्ती का भी नया रंग रोगन हो गया था । खाली प्रांगण से एक नया विवाहित जोड़ा सकुचाते निकलता  दिखा । 
मन्दिर के प्रवेश द्वार पर यश भी पहुंच गया था । मैंने शांत वातावरण में दस मिनट पूजा की । यश हाथ जोड़ने के बाद तुरत प्रसाद काउंटर की ओर लपक गया था । 1 क्विंटल चावल से बना भोग प्रसाद खत्म हो गया था । खाली बर्तन धोये जा रहे थे । यश खाली हाथ मुझे निहार रहा था । मैं मायूस लौटने वाला ही था की एक बुजुर्ग महिला ने पीछे से आवाज लगाई । उसने अपने निजी  डोलचे से निकाल कर आधा भाग खिचड़ी प्रसाद दो दोने में मुझे दिया । मुझे प्रसाद पाने में जितना आनंद आ रहा था उससे कहीं ज्यादा प्रसन्नता उसे प्रसाद देने में आ रही थी । 15 वर्षों बाद भी उसने मुझे पहचान लिया था । लौटते वक्त बहुत कोशिश करने पर याद आया । प्रत्येक अमावस्या पूजा में वह भोग प्रसाद प्रकरण में योगदान देती थी । 
बहुत दिनों से सुनता आ रहा था की माँ के बुलावे पर ही दर्शन सम्भव होता है वह भी लगन और जांचने परखने के बाद ।

Monday, 9 October 2017

जीना इसी का नाम है - 1 !

बचपन का एक बेहतरीन आनंद पड़ोस के जज चाचा ने छीन लिया । दोनों के घर को बांटनेवाले 30x 4 फ़ीट के गलियारें में ही क्रिकेट खेलने की जगह बनती थी पर उनके खिड़की में कांच के शीशे लगे थे । इधर कुछ दिनों से मेरे सामने की खिड़की से सटकर बच्चे क्रिकेट खेलते रहते हैं । टेनिस बॉल कभी-कभी शीशे से भी टकराती रहती है । बच्चे जब सोये रहते हैं तो मैं नटखट बच्चों के दांत तोड़ लेता हूँ ये उन सभी को मालूम है । फिर भी वे डरते नहीं । उन्हें मालूम है की 100-200 रुपये के शीशे के चलते उनके अनमोल बचपन पर कोई अंकुश लगने वाला नहीं । खिड़की के बाहर का माहौल  बच्चे गुलज़ार रखते हैं और अंदर कंप्यूटर पर बैठा मैं ऊबता नहीं हूँ । मुझे बचपन जीना आता है ।