तकरीबन २५ साल पहले अखबार घर-घर पहुचाने का काम 30-40 वर्ष के व्यस्क किया करते थे. बाजार और प्रेस के पास किशोर लड़के “आज की ताजा खबर” चिल्लाते अखबार बेचते नजर आते थे. पर अब बहुत कुछ बदल गया है. दिवंगत राष्ट्रपति माननीय अबुल कलाम का जीवन चरित इसका मुख्य कारण है. अब ज्यादातर किशोर साइकिल पर फेरी लगाते दीखते हैं. बहुतों के कान में ईयरफोन भी लगा रहता है. रोमांच तो तब आता है जब वे तीसरी और चौथी मंजील की सिमटी बालकनी में अखबार का बण्डल फेंकते नजर आते हैं. बिलकुल सटीक. अखबार का फेरी लगाने का कार्य सूर्योदय की आसपास समाप्त हो जाता है. इससे उन्हें रोजाना 100-200 रुपये की आमदनी हो जाती है.
जैसा मेरे अशोकनगर, रांची की कॉलोनी में होता है वैसा देश के हरेक कोने में होता ही होगा. सुबह की सैर के बाद जब मैं पार्क में आकर बैठता हूँ तो वही फेरी लगाने वाले किशोर क्रिकेट खेलते नजर आते हैं. क्रिकेट का बैट और विकेट उनके साइकिल के डंडे पर बंधा रहता है. जाहिर है सुबह की साइकिल पर मशक्कत उनके शरीर पर पूरी निखरी नजर आती है और क्रिकेट के खेल में भी. केवल चौओं और छक्कों की बरसात देखने को मिलती है. टेनिस बाल से 60-70 मीटर लम्बी दूरी पार करना कमाल की बात है. बोलिंग में भी काफी तेज रवानगी होती है. मैदान ढंग का नहीं है इसलिए उन्हें मैंने भागते बाल को पकड़ने के लिए डाइविंग और स्लाइडिंग करते नहीं देखा.
आज मैं लॉन्ग-ऑन पोजीशन पर लगे बेंच पर बैठा था. खेल ख़त्म हुआ. मेरी बगल में एक लड़के की साइकिल लगी हुई थी. लौटने के पहले वह सुस्ताने और अपने जैकेट पहनने मेरी बगल में बैठ गया. मैंने जिज्ञासावश पूछा कि अब इसके बाद तुम्हारी क्या रूटीन होगी. उसने कहा कि वह बिजली बोर्ड में दिहाड़ी पर ट्रांसफॉर्मर वाइंडिंग का काम करता है रोजाना 300 रुपये पर. मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसके सब साथी किसी न किसी प्रयोजन में लगे हैं. कोई कॉलेज में पढ़ रहा है, कोई डिप्लोमा कर रहा है. कोई दुकान पर अपने पिता का हाथ बता रहा है, कुछ ऑटोरिक्शा चलाते हैं और वह लाल टी-शर्ट वाला लम्बू ग्रेजुएशन के बाद कंप्यूटर ट्रेनिंग भी देता है.
अगर ऐसा ही पूरे देश में हो रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं कि भारत अगले कुछ वर्षों में दुनिया का अग्रणी बन जाए.
जैसा मेरे अशोकनगर, रांची की कॉलोनी में होता है वैसा देश के हरेक कोने में होता ही होगा. सुबह की सैर के बाद जब मैं पार्क में आकर बैठता हूँ तो वही फेरी लगाने वाले किशोर क्रिकेट खेलते नजर आते हैं. क्रिकेट का बैट और विकेट उनके साइकिल के डंडे पर बंधा रहता है. जाहिर है सुबह की साइकिल पर मशक्कत उनके शरीर पर पूरी निखरी नजर आती है और क्रिकेट के खेल में भी. केवल चौओं और छक्कों की बरसात देखने को मिलती है. टेनिस बाल से 60-70 मीटर लम्बी दूरी पार करना कमाल की बात है. बोलिंग में भी काफी तेज रवानगी होती है. मैदान ढंग का नहीं है इसलिए उन्हें मैंने भागते बाल को पकड़ने के लिए डाइविंग और स्लाइडिंग करते नहीं देखा.
आज मैं लॉन्ग-ऑन पोजीशन पर लगे बेंच पर बैठा था. खेल ख़त्म हुआ. मेरी बगल में एक लड़के की साइकिल लगी हुई थी. लौटने के पहले वह सुस्ताने और अपने जैकेट पहनने मेरी बगल में बैठ गया. मैंने जिज्ञासावश पूछा कि अब इसके बाद तुम्हारी क्या रूटीन होगी. उसने कहा कि वह बिजली बोर्ड में दिहाड़ी पर ट्रांसफॉर्मर वाइंडिंग का काम करता है रोजाना 300 रुपये पर. मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसके सब साथी किसी न किसी प्रयोजन में लगे हैं. कोई कॉलेज में पढ़ रहा है, कोई डिप्लोमा कर रहा है. कोई दुकान पर अपने पिता का हाथ बता रहा है, कुछ ऑटोरिक्शा चलाते हैं और वह लाल टी-शर्ट वाला लम्बू ग्रेजुएशन के बाद कंप्यूटर ट्रेनिंग भी देता है.
अगर ऐसा ही पूरे देश में हो रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं कि भारत अगले कुछ वर्षों में दुनिया का अग्रणी बन जाए.

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