Friday, 20 February 2015

ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी !

आज हमलोग ऑस्ट्रेलिया में छः माह के प्रवास के बाद लौट जायेंगे अपने वतन. अहले सुबह श्रीमती भी तैयार हो गयीं टहलने के लिए. रास्ते भर याद दिलाती रही कि अब कल ये नहीं दिखेगा , वो नहीं सुनायी देगा वगैरह.
आज तालाब पर भी जैसे सभी बत्तकें लौट आयी थी विदाई पार्टी के लिए. हमलोग भी काफी मात्रा में रोटी/ब्रेड ले गए थे. सूर्य देवता भी बादलों पर भरसक ज्यादा ही रंग बिखेर रहे थे.
घर लौटा. बेटी ने नाती को तैयार कर दिया था स्कूल के लिए. आज आखिरी बार मैं उसे स्कूल ले जा रहा था. हमेशा चहकने वाला आज रास्ते भर साईं ने  बात नहीं की. मैं जब पूछा तो उसने कहा कि वह उदास है. फिर उसने सर उठाकर मेरी आँखों में झांका और तुरत जोड़ा- नानू, तुम्हारे जाने के चलते नहीं, बल्कि कल मेरी फेनली से लड़ाई हो गयी है. मैंने कुछ नहीं कहा . कल उसे स्कूल से वापिस लाते वक्त हमेशा की तरह फेनली से गले मिलते देखा था.
घर लौटा तो ऐप पर मेरे मित्र लक्ष्मी का हैप्पी जर्नी का सन्देश देखा. उसे धन्यवाद् देने के लिए मैंने फ़ोन किया. उसने पूछ - उदास हो. मैंने कहा- नहीं ! अब आदत सी  हो गयी है. उसने कहा- अरे यार ! काफी अरसे के बाद जेल से छूटते वक्त कैदी भी रोने लगता है.
लक्ष्मी ठीक कह रहा था. मेरा अनुभव तो कुछ ज्यादा ही हैरानीयत भरा था . मेरी एक दूर के रिश्ते की मौसी को जब दुबारे वापिस पागलखाने ले जाया जा रहा था तो रास्ते भर वह बहुत उदास रही. पागल खाने की ऊंची गेट को देख कर उसका चेहरा खिल गया और अन्दर पहुंचते ही वह दूर खड़ी डॉक्टर श्रीमती डेविस के पास दौड़ती हुई पहुंची और खिलखिला कर गले मिली थी.
फिल्म बूट पोलिश का वह मशहूर गाना " रात गयी फिर दिन आता है. इसी तरह आते जाते ही यह सारा जीवन जाता है" , मैंने लक्ष्मी को ऐप करना मुनासिब समझा. 

Friday, 13 February 2015

हैप्पी बर्थडे !

लोग जन्मदिन को लेकर भावुक हो ही जाते हैं. इस बार जिनसे मैं जन्मदिन की बधाई की अपेक्षा रखता था उनमें से शायद ही कोई छूटा हो. जो नजदीक थे उन्होंने रूबरू, जो दूर थे उन्होंने फ़ोन पर और फेसबुक पर मुझे बधाई दी. पर जिससे मैं अहले सुबह बधाई की अपेक्षा  रखता था उसने, मेरी  पत्नी ने आखिरकार शाम ढलते-ढलते पूछ ही लिया कि क्या बात है आज बहुत फ़ोन कॉल आ रहे हैं.
मैं उस दिन , बल्कि छः महीनों से अपनी बेटी के घर आया हुआ था. यहाँ, ऑस्ट्रेलिया में बल्कि हर कहीं जहां मिया-बीबी दोनों नौकरी करते हों वहां जन्मदिन तो क्या सभी कुछ यहाँ तक कि राष्ट्रिय त्यौहार भी वीकेंड्स में मनाये जाते हैं. मेरे जन्मदिन का जश्न भी आनेवाले शनिवार को घर से बाहर किसी  होटल में मनाने का  मन बन रहा है. लेकिन मेरा जन्मदिन तो एक नहीं बल्कि तीन छोटे-छोटे वाकयों से बहुत सुन्दर मन गया.
मेरे सुबह की सैर से वापिस आने की आहट सुनकर मेरे 5 वर्षीय नाती ने सुबह नहाना छोड़कर  पूरे नंगे बदन दौड़कर दरवाजा खोलकर मुझे हैप्पी बर्थडे कहा.
आज उसके स्कूल में भी तीन साथियों का बर्थडे था. सभी बच्चों को लौटते वक्त भी टॉफी-चोकलेट का पैकेट मिला. साई ने स्कूल से लौटते वक्त मुझे यह बात बताई.
उसने कहा- आज मेरे चार दोस्तों का बर्थडे था.
मैंने उसे सुधारते हुए कहा - चार नहीं तीन, मैंने नोटिस बोर्ड पर उनका नाम भी देखा है.
उसने तुरत कहा- नानू ! आप अपने को नहीं गिन रहे हो !
उसे कम से कम तीन घंटे लगे अपने लालच पर लगाम लगाने में. मैं शाम को, पिछवाड़े पौधों को पानी देने गया था तभी उसने  मुझे कान में दुबारे हैप्पी बर्थडे कहा और चुपके से मेरी जेब में स्कूल से मिली चोकलेट बार डाल दी. 

Sunday, 8 February 2015

आम आदमी !

मैं तो रसिपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण के आम आदमी का शुरू से प्रशंसक था पर इसकी काबलियत पर संदेह होता था. गो कि गाँधी तक को इसने महात्मा बनाया. जब चाहे शाहरुख़ को नचा ले, तेंदुलकर से शतक बनवा ले. भगवान्  राम तक  इनकी बात मानते थे. गौतम को भी भगवान बुद्ध बनने में प्रेरणा इन्ही से मिली थी. राजनेता इस भूल में हैं कि ये जनता को बेवकूफ बना रहे हैं. पूरे जीवन , यही आम आदमी है जो ज़िन्दगी के हर रंग का आनंद लेता है बाकि तो इनकी कठपुतलियाँ हैं. चलो अब कुछ दिन दिल्ली-दिल्ली खेलें उसके बाद बिहार वाली नौटंकी देखेंगे. 

Thursday, 5 February 2015

ये दुनिया या वो दुनिया !


आज सुबह तडके जब मैं तालाब के किनारे बत्तकों को रोटी खिलाने पहुंचा तो भौचक रह गया. आज न तो बत्तकें दौड़ती हुई मेरे पास आ यी, न कोई उड़कर मेरे बगल में पहुंचा और न किसी ने पीछे से चोंच मारकर अपनी मौजदगी बतायी.
मुझे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर जो सबसे सुखद क्षण बिताने का मौक़ा मिलता है वह या तो बच्चों के साथ या फिर प्रकृति के विभिन्न आयामों के साथ. गो कि सूर्योदय और सूर्यास्त मैं कभी चूकना नहीं चाहता पर मुझे आकाश और उसपर छाये बादल तक हमेशा बहलाते रहते हैं. पेड-पौधे, उनके पत्ते, पत्तों से छनकर आती धूप की किरणे, रंग-बिरंगे फूल कभी भी रोमांचित करते रहते हैं. पर जब कोई पशु या पक्षी अपनापन दिखलाने लगता है तब मुझे यह अहसास होने लगता है कि प्रकृति भी मुझे अपना दोस्त मानती है. उसी कड़ी में , मैं कभी तालाब की मछलियों से नजदीकी करता हूँ, कभी गिलहरियों  को मूंगफली खिलाकर दोस्ती करता हूँ तो कभी बत्तकों को रोटी खिलाकर गौरवान्वित महसूस करता हूँ.

मैं इस तालाब के पास रहने को कुछ महीनों के लिए आया हूँ और जल्दी ही इससे दूर चला जाऊंगा. जैसे जैसे वापिस जाने का दिन नजदीक आता जा रहा है, मैं इस सोच से परेशान हूँ कि ये बत्तकें मेरे जाने के बाद मेरा इन्तजार करती रहेंगी.
पर आज जो दो-चार बत्तकें बड़ी मुश्किल से मेरे पास आयी और रोटी के टुकड़ों को अपनी चोंच में लिया, वे सभी अनजानी बत्तकें थीं.
लौटते वक्त, इतनी छोटी पर इतनी गहरी बात मेरी समझ में आयी. मेरी दोस्त बत्तकों ने अब अपना कोई दूसरा आशियाना ढूंढ लिया था या फिर आज माघ पूर्णिमा के दिन उनके लौटने का दिन हो आया था. और अब इस तालाब में किसी दूसरे जगह से नयी बत्तकें आ जायेंगीं.

अब मुझे भी ये जगह छोड़कर अपने वतन वापिस लौटने में ज्यादा दुःख नहीं होगा.

दिनांक : 04.02.2015