बचपन की दुनिया खेलों की दुनिया थी ।
सोते-जागते बस एक ही बात उकसाती रहती थी और वह था दोस्तों के साथ मस्ती करना । कोई
भी सुना या जाना हुआ खेल अछूता नहीं रहता था । कोना-कोनी, रूमाल चोर, चोर-सिपाही,
आस-पास, पिट्टो, बम-बाल, लट्टू, इक्कट-दुक्कट, डोल-पात, कुछ ऐसे खेल थे जिन्होंने
कब बचपन की दुनिया आँखों से ओझल कर दी मालूम ही नहीं पड़ा ।
बचपन और किशोरावस्था के बीच एक जोखिम भरा
अंतराल था, शरारत से भर-पूर जहां “इग्नोरेंस इस ब्लिस” की हवा बहती थी । ऊँचे-ऊँचे
पेड़ों पर चढ़ना, मुश्किल जगहों से फल चोरी करना, नदी-तालाब में बिना तैरना जाने
छलांग लगा देना, भुतहे कहे जाने वाले धुप अँधेरे कमरे में चले जाना, और अपने से बड़ों और मजबूत कद-काठी लोगों से पंगा लेना आम बात होती
थी ।
पिछवाड़े की गली से जब कभी स्कूल के लिए
शोर्टकट लगाते तब राय महाशय के सात-आठ फीट ऊँची दीवार पर नुकीले शीशों से ढकी
मुंडेर से झांकते कच्चे आम के टिकोरे बरबस ठहरने को और ललचाने को मजबूर कर देते ।
एक दोपहर , स्कूल से साथियों के साथ लौटते समय चढाई की योजना बन ही गयी । सबसे
भारी-भरकम साथी के कंधे पर सवार होकर, नुकीले शीशे को मोटे बोरे से निरस्त्र कर, खूब
सारा टिकोरा तोड़ भाग लिए । उसी दिन देखा की उनके बगीचे में अमरुद के पेड़ पर भी
काफी कच्चे अमरुद लगे थे । एक दोपहरी हमलोगों का पूरा झुण्ड उसी तरह उनके बगीचे
में उतर आया । एक डाल से दूसरे डाल, एक पेड़ से दूसरे पेड़ , दीवार के पास के सभी
पेड़ों को खाने लायक अमरूदों से अनाथ कर, मात्र 5 मिनटों में हमलोग चलते बने ।
दूसरे दिन मेरे घर राय आंटी धमक गयी । उन्होंने मुझे बुलवाया । प्यार से सर सहलाया
। शायद चूमा भी । मेरी माँ के सामने उन्होंने अमरुद और पके केले से भरा थैला मेरे
सामने रख दिया और कहा-“ सब मिल बैठ के खाना ।हम और हमारा मिस्टर अकेले रहता है ।
कोई और नहीं है । जब भी मन करे हमारा बाड़ी आगे से आना और जितना चाहे अमरुद तोड़ना ।
मौसम में आम और लीची भी होता है ।” उन्होंने अमरुद की चोरी वाला काण्ड माँ को एकदम
नहीं बताया । 
उसके बाद हमलोगों ने कभी भी उनके घर का
रास्ता नहीं लिया ।शायद लज्जा आती हो या फिर एक दूसरा एडवेंचर राजेंद्र नगर आम
बगान एन नजर आने लगा था । तब बात समझ में नहीं आयी थी , अब 60 वर्ष बाद समझ में आ
गयी है ।
इस बरसात मेरे घर के पीछे वाली दीवाल से
सटे हुए अमरुद के पेड़ पर ढेर सारे अमरुद लगे थे । घर के आउट हाउस में रहने वाले
परिवारों के बच्चे स्कूल से लौटने के बाद पहला इंटरव्यू उन्ही दो अमरुद के पेड़ों
का लेते ।एक दोपहरी मैंने देखा की उनमें सबसे छोटा 4 वर्ष का लड़का भी पेड़ पर चढ़ा
हुआ था । वह गिर कर चोटिल भी हो सकता था । मुझे देखते ही सब फुर्र हो गए । उनलोगों
को मैंने बाकायदा सीढ़ी चढ़ कर पेड़ तक जाने की इजाजत दे दी । एक-दो बार वे गए भी । उसके
बाद न तो वे चोरी से अमरुद तोड़ते और न तो सीढ़ी से चढ़कर मेरी जानकारी में । उनलोगों
की उदासीनता मुझे खलने लगी । डाल पर पककर अमरुद गिर रहे थे । शाम को मैंने देखा पूरा
एक झुण्ड अमरुद की चोरी कर रहा था । ये झुण्ड तोतों का था । मैंने उनका नजदीक से स्नेप
लेना चाहा । उनका शोर देखने और सुनाने लायक था । ऐसा लगता था की मैंने उनके क्षेत्र
में सेंध मारने की कोशिश की हो ।
तभी बरबस मुझे मार्क ट्वेन के लिखी
“एडवेंचरस ऑफ़ टॉम सॉयर” की याद हो आयी । उस किताब का सार ही था - जो मजा चोरी करके
खाने में है... जितना जोखिम उतना मजा ...
No comments:
Post a Comment