Saturday, 5 August 2017

चोरी चोरी

बचपन की दुनिया खेलों की दुनिया थी । सोते-जागते बस एक ही बात उकसाती रहती थी और वह था दोस्तों के साथ मस्ती करना । कोई भी सुना या जाना हुआ खेल अछूता नहीं रहता था । कोना-कोनी, रूमाल चोर, चोर-सिपाही, आस-पास, पिट्टो, बम-बाल, लट्टू, इक्कट-दुक्कट, डोल-पात, कुछ ऐसे खेल थे जिन्होंने कब बचपन की दुनिया आँखों से ओझल कर दी मालूम ही नहीं पड़ा ।
बचपन और किशोरावस्था के बीच एक जोखिम भरा अंतराल था, शरारत से भर-पूर जहां “इग्नोरेंस इस ब्लिस” की हवा बहती थी । ऊँचे-ऊँचे पेड़ों पर चढ़ना, मुश्किल जगहों से फल चोरी करना, नदी-तालाब में बिना तैरना जाने छलांग लगा देना, भुतहे कहे जाने वाले धुप अँधेरे कमरे में चले जाना, और अपने से बड़ों और मजबूत कद-काठी लोगों से पंगा लेना आम बात होती थी ।

पिछवाड़े की गली से जब कभी स्कूल के लिए शोर्टकट लगाते तब राय महाशय के सात-आठ फीट ऊँची दीवार पर नुकीले शीशों से ढकी मुंडेर से झांकते कच्चे आम के टिकोरे बरबस ठहरने को और ललचाने को मजबूर कर देते । एक दोपहर , स्कूल से साथियों के साथ लौटते समय चढाई की योजना बन ही गयी । सबसे भारी-भरकम साथी के कंधे पर सवार होकर, नुकीले शीशे को मोटे बोरे से निरस्त्र कर, खूब सारा टिकोरा तोड़ भाग लिए । उसी दिन देखा की उनके बगीचे में अमरुद के पेड़ पर भी काफी कच्चे अमरुद लगे थे । एक दोपहरी हमलोगों का पूरा झुण्ड उसी तरह उनके बगीचे में उतर आया । एक डाल से दूसरे डाल, एक पेड़ से दूसरे पेड़ , दीवार के पास के सभी पेड़ों को खाने लायक अमरूदों से अनाथ कर, मात्र 5 मिनटों में हमलोग चलते बने । दूसरे दिन मेरे घर राय आंटी धमक गयी । उन्होंने मुझे बुलवाया । प्यार से सर सहलाया । शायद चूमा भी । मेरी माँ के सामने उन्होंने अमरुद और पके केले से भरा थैला मेरे सामने रख दिया और कहा-“ सब मिल बैठ के खाना ।हम और हमारा मिस्टर अकेले रहता है । कोई और नहीं है । जब भी मन करे हमारा बाड़ी आगे से आना और जितना चाहे अमरुद तोड़ना । मौसम में आम और लीची भी होता है ।” उन्होंने अमरुद की चोरी वाला काण्ड माँ को एकदम नहीं बताया ।
उसके बाद हमलोगों ने कभी भी उनके घर का रास्ता नहीं लिया ।शायद लज्जा आती हो या फिर एक दूसरा एडवेंचर राजेंद्र नगर आम बगान एन नजर आने लगा था । तब बात समझ में नहीं आयी थी , अब 60 वर्ष बाद समझ में आ गयी है । 

इस बरसात मेरे घर के पीछे वाली दीवाल से सटे हुए अमरुद के पेड़ पर ढेर सारे अमरुद लगे थे । घर के आउट हाउस में रहने वाले परिवारों के बच्चे स्कूल से लौटने के बाद पहला इंटरव्यू उन्ही दो अमरुद के पेड़ों का लेते ।एक दोपहरी मैंने देखा की उनमें सबसे छोटा 4 वर्ष का लड़का भी पेड़ पर चढ़ा हुआ था । वह गिर कर चोटिल भी हो सकता था । मुझे देखते ही सब फुर्र हो गए । उनलोगों को मैंने बाकायदा सीढ़ी चढ़ कर पेड़ तक जाने की इजाजत दे दी । एक-दो बार वे गए भी । उसके बाद न तो वे चोरी से अमरुद तोड़ते और न तो सीढ़ी से चढ़कर मेरी जानकारी में । उनलोगों की उदासीनता मुझे खलने लगी । डाल पर पककर अमरुद गिर रहे थे । शाम को मैंने देखा पूरा एक झुण्ड अमरुद की चोरी कर रहा था । ये झुण्ड तोतों का था । मैंने उनका नजदीक से स्नेप लेना चाहा । उनका शोर देखने और सुनाने लायक था । ऐसा लगता था की मैंने उनके क्षेत्र में सेंध मारने की कोशिश की हो ।
तभी बरबस मुझे मार्क ट्वेन के लिखी “एडवेंचरस ऑफ़ टॉम सॉयर” की याद हो आयी । उस किताब का सार ही था - जो मजा चोरी करके खाने में है... जितना जोखिम उतना मजा ...

  

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