Wednesday, 29 April 2020

Cloud, Cloud Come Again !!

During my post-graduation days, I read an article. It said that to keep a room clean, a positive pressure inside the room is needed. It means that if such a positive pressure is created through a ventilator system, outside dust would not be able to enter the room. Contrarily, a negative pressure would attract dust and particles

Ranchi is a place which is surrounded by hills and mountains from all sides. Once the clouds get trapped, it feels better in relieving itself rather than climbing the mountains and run away. A calm, slightly negative pressure attracted the clouds.

Once upon a time Ranchi was a hill station and summer capital. Even in the 1960’s, the population was well under one lakh. 90% land inside Ranchi district was covered with green flora. There was not a single high-rise building. Vehicles on the roads were scarce. There was negative pressure. Clouds came in running.

Things changed drastically. We were witnessing more arid and warm days than cooler and wet days. The pollution from vehicles and factories together with greenhouse effect created by high rise buildings congesting roads and lanes had created a positive pressure. This positive pressure was driving away clouds back beyond the mountains.

Corona virus lockdown for such a brief period seems to have upturned the malice of last 50 years. Since a fortnight, we are having regular rains when it becomes hot. Hot depression with negative pressure is more inviting.

Tuesday, 28 April 2020

टिकोरे

जो बातें शहर के लिए आम हैं वह गाँव के लिए खास हो जाती हैं। इसी तरह गाँव की आम बातें शहर के लिए खास हो जाती है। जब आम के पेड़ में बेशुमार मंजर आते हैं और मंजर टिकोरों(कच्चे आम) में परिवर्तित हो बड़े होने लगते हैं और जब आँधी-तूफान आकर आम के पेड़ों का बोझ हल्का कर देते हैं तब गाँव में कोलाहल नहीं मचता। रखवाले अपने-अपने बगान के टिकोरे जमा कर लेते हैं । उनका व्यंजन व आचार में भलीभाँति उपयोग हो जाता है। आजकल शहर में किसी-किसी के ही घर के बाड़े में जमे इकलौते आम के पेड़ इस तरह की मस्ती दिखा पाते हैं। अगर उस घर में बच्चे हुए या अड़ोस-पड़ोस में बच्चे हुए तो हँगामा बरप जाता है। मेरे ललाट पर कटीले तार से बनी लकीर अब तक कामयाब है। तब बहुत खून बहा था। पड़ोस के बाड़े में बहुतेरे टिकोरे गिरे थे।

आजकल लोकडाउन में बस जरूरत की सब्जी घर आती है। 5 किलोमीटर दूर पश्चिम के गाँव पुनदाग से औरतें , टोकरा भर सब्जी सिर पर लादे, पुलिस से छिपते-छिपाते रेल लाइन के किनारे चलते हमारी सोसाइटी में आ जाती हैं। जल्दी से पर महंगी सब्जी बेचकर भाग निकलती हैं। कुछ भी कहिए बहुत दिनों बाद ताज़ी सब्जी खाने को मिलने लगी है। अब इसमें कच्चे आम, पुदीना और धनिया की चाह करना तो नादानी होगी।


कच्चे आम के मौसम में मेरे घर का सबसे सुस्वादु पकवान(delicacy) है कच्चे आम की खट्टी-मीठी, या गुरममा। इसे तेजपत्ते, पंचफोरन और लाल मिर्च के तड़के पर गुड़ में बनाया जाता है। उसके साथ मेल खाता चने दाल की दलभरी(भरुवा परोंठा) परोसे जाने के पहले ही भूख बढ़ा देता है। श्रीमति बहुत निपुणता से इन्हे बनाती है। मैं बचपन से इसका शौकीन हूँ। ननिहाल में मेरी आवभगत इसी से होती थी। माँ मेरे लिए बड़े चाव से बनाती थी। अब भी मन उसी तरह ललचा जाता है। पर कच्चे आम कहाँ से मिले। घर से सटे आम के पेड़ में बहुत टिकोले लगे हैं पर इस पेड़ के पके आमों का तो जवाब नहीं।

कल बिल्ली के भाग से छिंका टूटा। बहुत ज़ोर की आँधी के साथ बारिश आई। मेरे घर के पिछवाड़े लगे आम के पेड़ से बहुत से टिकोरे गिरे। आधे घंटे बाद बारिश-आँधी रुकी। उतनी देर हम मिया-बीबी और आउटहाउस के बच्चे दरवाजे खोल बारिश रुकने का इंतजार कर रहे थे।

उसके बाद वह हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। हम दोनों और आउटहाउस के बच्चे साथ-साथ दौड़े टिकोरे चुनने। पर बच्चों के सामने हमलोगों की क्या बिसात। तय हुआ की आधा-आधा बाँट लिया जाए।

कोरोना ने हम बुजुर्गों का बचपना लौटा दिया है।

Sunday, 5 April 2020

किशोर का जवाब नहीं !

लता मंगेशकर और आशा भोसले ने किशोर के साथ डुएट गाना बंद कर दिया था। कारण बहुत ही मजेदार था। डुएट में किशोर अपना मुखड़ा गा लेते थे पर जब लता या आशा की बारी आती तो कुछ न कुछ ऐसी मिमिकरी कर देते की हँसना रुकता ही नहीं। पेट में बल ही नहीं पड़ते, लता और आशा की शिकायत थी की उनका हँसते-हँसते गला बैठ जाता। रेकोडिंग मुल्तवी कर दी जाती। इसके कारण आर्थिक नुकसान के अलावा अगले डेट्स मिलने में भी परेशानी होती। बहुत अरसे तक, डुएट अकेले-अकेले रेकॉर्ड कर उन्हें मिक्स कर दिया जाने लगा ।

एक गाना ऐसा आन पड़ा जो बातचीत की तर्ज़ पर था। “आपकी कसम” का यह डुएट साथ-साथ गाना जरूरी था। मामले की नज़ाकत देखते हुए, लता मान गई।

रिकॉर्डिंग रूम में सब कोई जमा हो गए। किशोर पहली बार संजीदा दिखे। सब तैयारी हो गई। भला किशोर इतनी देर चुप कैसे रहते। जैसे ही किशोर ने मुंह खोला , लता उठकर बाहर जाने लगीं। किशोर मिन्नत करते हुए बोले- दीदी, मैं जो कहने जा रहा हूँ वह इस गाने की बाबत ही कहने जा रहा हूँ। लता मान गईं।

किशोर ने कहा की इस गाने की लाइन से लगता है की गाने वाले कमोड पर बैठ कर गा रहे हैं। गाने की शुरुआती बोल पर ध्यान दीजिएगा -

“सुनो

कहो कहा सुना

कुछ हुआ क्या?

अभी तो नहीं

कुछ भी नहीं”

अभी लता का हँसना अपनी ऊंचाई पर पंहुचना बाकी ही था की किशोर ने बाकी कसर पूरी कर दी। अब आखिरी मुखड़ा सुन लीजिये -

“चली हवा

झुकी घटा

कुछ हुआ क्या?

ज़रा सा कुछ हुआ तो है ...”

लता का हँसते-हँसते पेट ऐठने लग गया। गला बैठ गया। रेकोडिंग फिर मुल्तवी हो गई।

Thursday, 2 April 2020

आ अब लौट चले -2

आज कबूतरों के लिए डाले गए दानों पर 8-10 कौओं ने हमला बोल दिया। कारण समझ में आया। रोडसाइड ढाबे और ठेलों के कचरों में भारी कमी नहीं बल्कि बिलकुल बंदी आ गई है। घर के चौके में भी किफायत देखने को मिल रही है।

आजकल लोगबाग कचरे कम फेंक रहे हैं डस्ट्बिन में। सफाई कर्मचारी, जो दरवाजे से कचरा उठता था अब नहीं दिख रहा है। इससे एक और मूल्य-वर्धन(value addition) की चमक कौंध रही है। क्यों न घर के पिछवाड़े एक 1*1*1 मिटर का पिट बनाया जाए। जिसमे हर रोज का ग्रीन कचरा डाला जाए और उसे मिट्टी की एक परत से ढँक दिया जाए। कुछ केचुए भी डालने से श्रेयस्कर होगा। 2-3 महीने लग जाएंगे भरने में। घर की बगिया के लिए जैविक खाद तैयार हो जाएगी जो वर्ष भर के लिए पर्याप्त होगी।

आजकल लोकडाउन पीरियड में अधिकतर वरिष्ठ नागरिकों ने अपना मनपसंद टाइमपास पुंरजीवित कर लिया है।मेरे समधीजी ने “दुनिया बनाने वाले” के karaoke पर कोरोना पर एक बहुत ही अच्छी परोडी मनोहारी आवाज़ मे गायी है। मेरे बड़े भैया सामयिक कविता और विचार लिखते रहते हैं। दूसरे बड़े भाई ने नतिनी से दोस्ती कर ली है। मेरा छोटा भाई स्टारमेकर का 5 स्टार गायक बन गया है। मेरे एक मित्र 60 वर्ष बाद फिर से लूडो खेलने लग गए हैं और जानबूझ कर हारकर दूसरे दिन की बुकिंग निश्चित कर  लेते हैं । मैं भी जैसे-तैसे लेखन कार्यक्रम मे बढ़ोतरी कर आनंदपूर्वक लोकडाउन की जैसी की तैसी कर रहा हूँ। कुछ नहीं तो नींद अच्छी आती है।

सोने से पहले मैं अपने-आप से पूछता हूँ – क्या मैंने  कोई भी लाभप्रद योगदान किया है ? अगले दिन के लिए भी कुछ ढूंढ निकलता हूँ। ज़्यादातर अच्छी नींद आ जाती है।

Wednesday, 1 April 2020

तलब

आजकल, कोरोना संक्रमण के दौरान  फोन बहुत ही कामयाब जरिया हो गया है समय बिताने का ।  उनके लिए तो जैकपोट है जो किसी कारणवश घर से दूर कहीं अटके हुए हैं। मेरे एक मित्र ग्रेटर नोएडा के अपार्टमेंट की छठी मंजिल पर अवस्थित हैं। जब लॉकडाउन नहीं था तो उससे बेहतर जगह कोई नहीं थी। पटना के एक मित्र डेहरी के पास किसी गाँव में नजरबंद हैं। बहन की ससुराल है इसलिए सारा समय ऊहापोह में गुजार रहे हैं। सबसे आनंद मे सिन्हा साहब हैं। मुंबई के ईस्ट मुलुंड में 14वी मंजिल पर अपनी बेटी और दामाद के साथ। सभी तरह का आराम है। अब उम्र 85 के पार है तो जरूरतें भी कम ही होगी सिवाय तबीयत चंगी रखने के। जैसे स्वर्ग में इंद्र और अन्य देवताओं को भी रह-रह कर बैचेनी होने लगती है वैसे ही सिन्हा साहब भी आजकल थोड़े अटपटे हो गए हैं। कारण उन्हे खैनी-गुटका की आदत है जो 3 दिन से खत्म हो गया है।

आज सुबह 9.30 बजे, जब सब कोई टीवी पर रामायण देखने में व्यस्त थे तब उन्हे मौका मिल ही गया। चुपके से, उसी पाजामे,कुर्ते और चप्पल में बाहर का दरवाजा बहुत धीमे से खोल और चाभी लेकर निकल पड़े। लिफ्ट से नीचे उतरे। एक फरलांग दूर गेट के पास पहुंचे। कैबिन में बैठा गार्ड चौकन्ना था। बिहारी था। उसने रोका। भोजपुरी में बतियाने पर जल्दी ही मेलजोल हो गया। तय हुआ की सिन्हा साहब कैबिन में बैठेंगे और वह मोड के पान दुकान से खैनी , गुटका, पुड़िया जो भी मिलेगा थोक में ले आएगा। 500 रुपये लेकर चला। आधे घंटे बाद खाली हाथ लौटा। कोई भी काम की दुकान खुली न थी। गार्ड के पास पैसे छोड़ चले आए। जब भी मिले, आते-जाते जहां भी मिले। इंटरकॉम पर इशारा मिलते ही लेन-देन फिक्स होना था।

सिन्हासाहब थोड़े निराश, थोड़े प्रसन्न, लिफ्ट से 14वी मंजिल आकर हौले से चाभी लगा दरवाजा खोला। पर ये क्या ? सामने उनकी बेटी और दामाद खड़े मिले। बेटी ने छूटते ही कहा – पापा ! गार्ड से फोन कर हमने सब मालूम कर लिया है। बाहर ही कपड़ा उतार कर टॉवल लपेटिए और सीधे बाथरूम जाकर डेटॉल और साबुन से नहा लीजिये।

यह सब सिन्हा साहब ने एक घंटे बाद मुझे सविस्तार बताया।