Saturday, 10 July 2021

India is Developing - 1

In the year 2014, I had the opportunity to spend some time in Pune and New Jersey (US). Among other things, what surprised me was the price of tomato. It was Rs.4/- per kg in Ranchi. It was Rs.16/- per kg in Pune. It was $4 per kg in NJ. Another difference that I noticed was quality of garbage and their disposal. In Ranchi, rummagers used to collect whatnots from the garbage. Pune was a bit more sophisticated. Its roadside garbage bins contained damaged/used goods and furniture’s. NJ showed affluence. By the roadside and preferably near the garbage bins, there were second hand and usable household items such as TV, sewing machine, gas burners, bicycle etc. I asked my daughter. She told me that buying new and latest products is more advantageous than mending/repairing old items. Repair is very costly with no guarantee. I returned to Pune after a year. I found a discarded laptop on the boundary sill of an apartment.

These days, even in small town like Ranchi, I find that buying new is wiser than getting old repaired. Repairmen have become more cunning and ruthless especially in Corona period. 3 years back they were charging Rs.30/- for servicing a gas burner. Now they hike the bill to Rs.1000/-. They usually find several spares to be replaced with so-called branded spares. After dismantling, they dictate .So  are the electrician, plumbers and the likes.

If you call service engineers from Call centers and help lines, you are duped more aggressively. They will open-up the non-functional  TV, microwave or washing machine and would lay down replacement price list of the company and suggest alternative routes at a far cheaper price. In addition, they would try to bag the so-called damaged parts too.

These days, in season, tomato price never goes down below Rs.20/- per kg in Ranchi. Off-season, it spirals up to Rs.200/-per kg.  NJ price is still $4-6.

Friday, 26 February 2021

एक उदघाटन ऐसा भी !

 सिन्हा साहेब से मेरा परिचय बहुत पुराना है. १९६९ में जब मैंने नौकरी हासिल की तब ये ही मेरे वरिष्ठ अधिकारी थे- तेज़मिजाजी और खुशमिजाजी का नायाब नमूना. प्रोन्नति नहीं हुई थी इसलिए क्रोध इनके नाक पर रहता था. आज २०२१ में जब ये अकेले अपने ३ सुस्थित बच्चों के बीच आवाजाही करते रहते हैं तब ८८ की उम्र में न मालूम कब और कैसे तेज़मिजाजी लुप्तप्रायः सी हो गयी. पिछले वर्ष कोरोना काल के आरम्भ में जब इन्हें अकेलापन खलने लगा तब अपने पुराने संगी-साथियों की भीड़ टटोलने लगे. जब धुंध छटा तब मैं ही इनका मैन-फ्राईडे बना- फ्रेंड,फिलोसोफर, गाइड. हर रोज तरह-तरह की बातें होती है मोबाइल पर. मैं उन्हें पुरानी घटनाएं याद दिलाता हूँ. याद आये न आये पर मेरी यादाशत की दाद देते हुए सारी बात खूब मजे लेकर सुनते हैं. अगर कुछ टुकड़े याद आ गए तब बात बहुत दूर तक चल जाती है. इसके अलावा फुटबाल और क्रिकेट लाइव देखकर पोस्टमोर्टेम भी घंटा भर खींच लेता है. जाहिर है सेहत भी एक गुफ्तगू का मसला रहता होगा. अकेलेपन को धत बताने के लिए इससे बढ़िया पासटाइम भला और क्या हो सकता है.

सिन्हा साहेब सबसे ज्यादा खुशहाल अपनी २ बेटियों के पास रहने पर महसूस करते हैं. इस पर ज्यादा तवज्जो देने की शायद ही आवश्यकता हो. बेटा जेनेरल मेनेजर है और चाहता है कि पिता उसी के साथ रहे. पर कहाँ ओडिसा का एक सुनसान क़स्बा और कहाँ मुंबई और दिल्ली. ओडिसा में गर्मी भी भयानक पड़ती है. सबसे ज्यादा परेशानी इस बात की है कि  वे बहू से पर्दानशीन हैं. बेटे-बहू और उनके दो व्यसक होते लड़के अपने रोजमर्रे के शगल  से समय निकालकर सिन्हा साहेब की भरपूर सेवा करते हैं.. दोनों बेटी-दामाद रोजाना फोन पर बातें करते हैं. दोस्ताना और अकेलापन जब खलता है तब उसकी खानापूर्ति मुझसे बात करके पूरी करते हैं. कभी-कभी तुनक मिजाजी की चिंगारी फूटती है, जैसे बाजार दूर होने, बेहद गर्मी होने के कारण और कोविद होने के कारण बेचारगी जब हद से गुजर जाती है तब भी मैं याद आता हूँ. सब मिलाजुलाकर सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है. पर ऊपरवाले ने ये दुनिया सब कुछ ठीकठाक रहने के लिए कदापि नहीं बनायी है. आखिर वह भी एक वरिष्ठ सत्ता है. हमलोगों से आखिरी हद तक "पुरातन" है. हम वरिष्ठों से ज्यादा उसे अकेलापन खलता होगा. उसका भी तो मन लगना चाहिए.

सिन्हा साहेब का टीवी कुछ दिनों से परेशान कर रहा था.  मरम्मत करने वाले को दो-तीन बार बुलाया गया. अन्त में उसने भी हार मान ली. सिन्हा साहेब ने इंडिया-इंग्लैंड का पहला दोनो क्रिकेट टेस्ट मैच किसी तरह फटे रंग और आवाज के साथ देख लिया. २४ फरवरी को दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम का उदघाटन तीसरे टेस्ट मैच के साथ होना था. बहू पूजा कर रही थी. बेटा ऑफिस चला गया था – रात ९ बजे लौटेगा. पोता अपने लैपटॉप पर विडियो-स्टडी में भरपूर व्यस्त था.

सिन्हा साहेब सुबह से ३-४ बार फोन कर चुके थे. उन्हें भरपूर शक हो गया था की अनदेखी हो रही है. उन्होंने यहाँ तक मिजाज़ बना डाला कि अगर किसी तरह वे दुकान तक चले जाएँ तो चेक काटकर टीवी ले आयें. मैंने उन्हें इन्टरनेट से डाउनलोड कर उनके शहर की टीवी शोप्स के विवरण का स्क्रीन शोट्स भेजा. आजकल तो सब चीज़ों की होम डिलीवरी होने लगी है. उन्होंने उसकी मदद से एक-दो दुकानों से बात भी की पर कोई भी उसी दिन डेलिवेरी देने को तैयार नहीं हुआ. कुछ देर सिन्हा साहेब ने मेरे द्वारा भेजे गए हॉटस्टार लिंक को डाउनलोड कर मैच देखा भी. पर बड़े स्वोक्रीन का आनंद मोबाइल में कहाँ. हार कर, पूरी दुनिया को कोसते हुए, सिन्हा साहेब सिर तक चादर ओढकर लेट गए. नींद भी आ गयी.

नींद में उन्हें किसी के कमरे में आने की आहट मिली. शायद रात का ८ बज गया था. शायद ठंडी हुई चाय उठाकर भोजन की थाली रखी जा रही होगी. १० मिनट से ज्यादा हो गए. न किसी ने उन्हें उठाने की कोशिश की और न सिन्हा साहेब ने चादर की ओट से माजरा तौलने की ही कोशिश की. नाराज जो चल रहे थे. आज वे भोजन भी नहीं करेंगे.

तालियों के शोर ने सिन्हा साहेब को आखिरकार उठने को मजबूर कर दिया. देखा ! एक नया- नवेला  टीवी टेबल पर शोभायमान है और तालियाँ रोहित के चौके पर बज रही है. यह भी देखा की पोते के पीछे-पीछे आँचल लिए बहूँ भी दबे पाँव कमरे से बाहर निकल रही है.

रात ९.३० में सिन्हा साहेब का फोन आया. उनका गला रूंधा हुआ था.

Thursday, 7 January 2021

रामेश्वर प्रसाद बरनवाल

१९६० के अक्टूबर माह में हमलोग झुमरी तिलैया  के हाई स्कूल में मेट्रिक के सेंट-अप टेस्ट की तैयारी में लगे थे तभी क्लास में रामेश्वर प्रसाद बरनवाल का पदापर्ण हुआ. उन्हें मेट्रिक की बोर्ड परीक्षा पुनः देनी थी. आजकल जैसे धोनी के मैदान में आते ही धोनी-धोनी की चैंटिंग होती है वैसे ही पोपटलाल-पोपटलाल की चैंटिंग होने लगी. सोशल साइंस के अंतर्गत बागवानी का फील्ड-वर्क भी हुआ करता था. उसके लिए चार-चार लड़कों का ग्रुप बनाया जाता था. पोपट लाल मेरे ग्रुप में आ गए. मैं उन्हें भैया कहकर संबोधित करता था. बागवानी क्लास के दौरान ही समझ में आ गया की उन्हें पोपटलाल क्यों कहा जाता था. कुछ दिन पहले जब प्यार किसी से होता है फिल्म आई थी जिसमें कॉमेडियन राजेंद्र नाथ का नाम पोपटलाल था. ये भी उसकी नक़ल करते थे. यहाँ तक की एक-दो कमउम्र लड़कों को छोड़ सभी फुलपैंट पहना करते थे. रामेश्वर जी सबसे बड़ा होने के बावजूद हाफपैंट पहनते थे.


रामेश्वर जी से अंतिम मुलाक़ात मेट्रिक परीक्षा के बाद मार्च महीने में हुई. वे पूर्णिमा सिनेमा हाल के मोड़ वाली दुकान पर पोस्टकार्ड पर पोस्टकार्ड लिखे जा रहे थे. उनकी आसानी के लिए पान दुकान के बाएं तरफ एक तख्ता भी लगाया हुआ था . मुझे बिमल राय की काबुलीवाला देखने की इजाजत मिली थी. मैं एक मीठा पान खाकर हाल में बैठने का इरादा रखता था. रामेश्वर जिनका मुंह हमेशा पान से रंगा रहता था ने मुझे पान खाने से एकदम मना कर दिया, कहा- मेरे जैसी आदत लग जायेगी.  

आज जब फेसबुक में मेरे छोटे भाई ने झुमरी तिलैया और रामेश्वर का जिक्र किया और मेरे मित्र अशोक ने भी व्हाट्सएप पर उसी कहानी को दोहराया तो मैं भी इन्टरनेट खंगालने लगा. रामेश्वर प्रसाद बरनवाल की अंतिम फोटो दिखाई पड़ी. चेहरे में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया था