Thursday, 28 April 2016

Om Prakash : An Actor of Class !

Om Prakash (19 December 1919 – 21 February 1998) was an Indian character actor. He was born in Lahore, now Pakistan as Om Prakash Chibber. He used to play the role of Kamla in the stage play by the famous Dewan Mandir Natak Samaj Koliwada. Starting his career in 1942, he was a popular supporting actor from the 1950s until the 1980s.
Om Prakash played the leading man in films like Dus Lakh, Annadata and Charandas 'Sadhu aur Shaitan'. His pivotal roles in the films Dil Daulat Duniya, Chupke Chupke, Julie, Joroo Ka Ghulam, Aa Gale Lag Jaa, Pyar Kiye Jaa and Buddha Mil Gaya are considered to be among his best along with Daddu in Namak Halaal and De Silva in Zanjeer. His roles in 'Sharabi', 'Bharosa', 'Tere Ghar Ke Samne', 'Mere Humdum Mere Dost', 'Loafar', 'Dil Tera Diwana' were also appreciated.
He is known for his roles in comedy films. One of his best performances in his later years were Naukar Biwi Ka, Sharaabi (1984) and Chameli Ki Shaadi, where he played a role that was pivotal for the movie.
ओम प्रकाश जैसे बहुमुखी चपल फ़िल्मी कलाकार को न तो कल के लोग भूलेंगे और न आज के । "दिल अपना और प्रीत पराई" , हावड़ा ब्रिज, से लेकर प्यार किये जा, जूली, चुपके चुपके, तेरे घर के सामने, नमक हलाल उनकी बेहतरीन अदाकारी की बहुत छोटी कहानी कहती हैं ।
1960 में बानी "दिल अपना और प्रीत पराई" में उन्होंने एक कैंसर मरीज की अमर भूमिका निभाई। रोते कलपते तो लोगों को मरते सभी ने देखा है पर हँसते हसांते मौत को गले लगाने की कला ओम प्रकाश की अदाकारी ने जीवंत की जो आज भी भूले नहीं भूलता। आपको अगर इस टक्कर की अदाकारी विश्व के किसी कलाकार को निभाते देखी हो तो बताएँगे ।

Wednesday, 27 April 2016

सत्यकाम : एक विचार : न आएगा दोबारा !

सत्यकाम(1969) को निर्देशक ऋषिकेश मुख़र्जी  अपनी सबसे अच्छी फ़िल्म मानते हैं। अनाड़ी( राज कपूर), आनंद और बावर्ची(राजेश खन्ना) जैसी नायाब फ़िल्म बनाने वाले से इससे अच्छी प्रसंशा और क्या हो सकती है। सत्यकाम, कहानीकार:  नारायण सान्याल, कलाकार : अशोक कुमार, संजीव कुमार, शरमीला टैगोर, डेविड, रोबी घोष, धर्मेन्द्र, कहानीकार : राजिंदर सिंह बेदी  जैसे बेमिसाल शिल्पियों की देन है। नायक धर्मेन्द्र ने अपने जीवन की सबसे अच्छी भूमिका निभाई है।
इस फ़िल्म को सबसे  अच्छी फ़िल्म और संवाद के लिए 1971 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला ।
फ़िल्म ऐसे सिविल इंजीनियर की कहानी है जो सत्य और ईमानदारी के लिए किसी स्थिति पर समझौता नहीं करता वह भी उस समय आज़ादी के बाद जब देश तेजी से भ्रष्टाचार के दलदल में धंसता चालक जा रहा है। जिन्हें सत्य पर चलने का अहंकार था , नायक के कट्टर रूढ़िवादी दादा को, वे भी अंत सत्य पर चलने का साहस कर पाये ।
पर तब के माँ- बाप अपने बच्चों को ऐसी फ़िल्म देखने के लिए उत्साहित करते थे । आजकल मना करते  है । बच्चा बिगड़ जायेगा ! स्वयं फ़िल्म को अपनी करतूतों पर एक करारा तमाचा मानते हैं।

Wednesday, 6 April 2016

सुबह के साथी

21वी सदी ने कदम रखते ही पुणे जैसा जीवन्त शहर मेरी झोली में डाल दिया। बच्चों की पढ़ाई और उसके बाद नौकरी , पुणे आना-जाना लगा रहता है। वैसे रांची और पुणे का क्लाइमेट बहुत कुछ मिलता जुलता है । पुणे दो बातों में रांची से अलग है । अव्वल तो इसमें मुम्बई महानगर की छाप एकदम झलकती है । दूसरे यहाँ लोगबाग़ अमन पसंद हैं । कभी-कभी तो ऐसा महसूस होता है कि शहर का पाषाण इलाका सीनियर सिटीजन के इर्द-गिर्द रचा-बसा है । सुबह सबेरे बुजुर्गों की सैर से सभी इलाका गुलज़ार हो जाता है । सुबह की यह वर्जिश अब रांची में भी दिखती है पर शुरूआती झिझक के साथ ।
पुणे में पूरा शहर सुबह घर के बाहर दीखता है । कमउम्र ज्यादातर जॉगिंग कर रहे होते हैं तो महिलायें बात करती अपना टारगेट तय करती हैं । बाशिंदे बुजुर्ग ग्रुप में हॅसते हँसाते बैठकी लगाते सुबह के स्वर्ग का भरपूर आनंद लेते हैं । मेरे जैसे विजिटर या तो अकेले या बीबी के साथ घूमते दिखेंगे । गर्व होता है उन बुजुर्ग महिलाओं और महाशयों पर जो शारीरिक रूप से कमतर हैं पर हौसला बुलंद बनाये हुए हैं । सबसे अच्छा लगता है इन सुबह के साथियों का पहनावा । युवक-युवतियों और महिलाओं से कदम ताल मिलाते बुजुर्ग मर्द भी कोई कसर नहीं छोड़ते हैं; रंगीन प्रिंट वाले टी शर्ट, हाफ या ¾ पैंट, सर पर मैचिंग कैप और लेटेस्ट स्पोर्ट या जॉगिंग जूते । थोड़ी और कमअक्ल होती तो मैं भी काम्प्लेक्स से बोझिल हो जाता । खैर एक बदलाव तो तुरत आ गया । कई दिनों से मेरा बेटा मुझे स्पोर्ट्स शू लिवा देने की मशक्कत कर रहा था । मेरी झिझक देख उसने अपना नया जूता आजमाने के लिए कहा । सच में , उसे पहन कर सुबह की सैर का लुत्फ़ दुगना हो गया । अब बेटे को शुक्रिया मुझे अपने अंदाज में देना था । मौका मिल ही गया ।
वह अपने दोस्तों के साथ दो दिनों के लिए गोआ घूमने गया । किसी काम से मैंने उसका वार्डरोब खोला तो उसके बेतरतीब ढंग से ठूंसे कपडे भरभरा कर बाहर गिर पड़े । पूरे दो घंटे लगे उसे ठीक करने में । 20 से ज्यादा तो टी शर्ट ही मिले ।
अगली सुबह मैंने उस खजाने से एक एडिडास की टी शर्ट पहन सैर को निकला । ऐसा महसूस  होता रहा कि सबकी निगाहें मुझी पर हैं । लौटने के पहले गिरमे पहाड़ी के पास के बेंच पर थोड़ी देर सुस्ताने बैठ गया । आज मेरी नजर खासकर हमउम्र लोगों के पहनावे पर थी । अब मुझे उनके चटकदार पहनावे का राज समझ में आने लगा । इनमें से बहुतों की जिंदगी मेरी जैसी ही होगी ।
कॉलेज जाने की उम्र में मेरे बेटे का डील डॉल मेरे जैसा ही था । जरूरत और मौके के अनुसार वह मेरे कपडे व् जूते पहन लिया करता । एक दो तो उसे इतने पसंद आते की मांग ही लिया करता । ईश्वर ने प्रत्येक कर्म को साइक्लिक रखा हुआ है । कहीं भी पसंगा या भूल-चूक-लेनी-देनी की गुंजाइश नहीं छोड़ी है ।