बचपन से देखता आ रहा हूँ। चाहे सत्यनारायण की कथा हो, श्राद्ध
हो, शादी हो या कोई और पूजा हो, समापन
पंडित की दक्षिणा से ही होता है। मेरे घर मे दुर्गा पूजा वर्ष 2000 से हो रही है।
पहले पूजा के कमरे मे फोटो से की जाती थी।
परिवार के सदस्य ही सम्मलित होते थे। उसके बाद पूजा स्थल कोर्टयार्ड के
उत्तर-पूर्व कोने मे मंडप मे परिवर्तित हो गया। पिछले 3 वर्षों से प्रतिमा आने
लगी। आरंभ से मेरा छोटा भाई नवरात्रि का व्रत रखकर दुर्गा शप्तशती का पाठ पूजा-स्थल
पर किया करता है। घर की सभी महिलाएं व्रत रखकर बकायदा पूजन-अर्चन करती हैं । जबसे
प्रतिमा स्थापित की जाने लगी, विधिवत पूजन करने एक पंडित
आने लगे हैं। पंडित जी नवरात्रि के समय 3-4 जगह पूजा करवाते हैं ।
नवरात्रि मे कलश-स्थापन के पूजन सामग्री और चढ़ावे की लिस्ट
बना ली जाती है। पहल पंडित जी की ओर से नहीं अपितु महिलाएं ही इस वाद मे उत्साह से
हिस्सा लेती हैं। पंडित जी भी एक-एक कर सब गिना देते हैं। एक चढ़ावा मुझे भी समझ मे
उस वक्त नहीं आया। पंडित जी ने कहा था की देवी का मुख दर्शन के लिए जमीन पर रखने
वाला शीशा और मेकअप का आइटम भी होना चाहिए ।
महिलायों ने ही खरीद-फरोख्त की। हरबार हाथ से पकड़ने वाला
शीशा आता था । इस बार दीवाल पर टाँगने वाला शीशा आया। मेकअप के सामानों मे
चूड़ी-सिंदूर के अतिरिक्त भी अवश्य कुछ और जोड़ा गया होगा। अष्टमी के दिन पंडित जी
आए। उन्होने सभी चढ़ावों का जायजा लिया। मुख दर्शन की विधि भी हुई। चढ़ावा समेटते वक्त
उन्होने शीशा वहीं छोड़ दिया। जब वे विदा होने लगे तो महिलायों ने उन्हें शीशा भी ले जाने का आग्रह किया । पंडित जी
टाल गए। मैंने पूछ ही लिया। उन्हे अपना दर्द बाटने मे कोई हिचक नहीं हुई।
दरअसल, पंडिताइन कई वर्षों से फरमायीश कर रही हैं एक
जमीन पर रखने वाले शीशे की । वही, जिसके सामने बैठ कर शृंगार
मेकअप किया जाता है। पंडित जी यह आइटम अपने सभी यजमानों के पास तभी से रखते आ रहे हैं
। यजमान लोग अपनी समझ के अनुसार सब तरह का शीशा दे रहे थे पर वैसा कोई नहीं दे रहा
था।
दरअसल पूजा के सभी सामग्री मय चढ़ावे के सामानों के साथ की
लिस्ट दुकान को दे दी जाती है। बंधा-बँधाया कार्टोन गाड़ी पर लोड हो जाता है। साड़ी महिलाएं स्वयं खरीदती हैं। पूजा-सामग्री की दुकान मे और ड्रेस्सिङ्ग टेबल ? अब भला 10 केजी भार वाला
भरी-भरकम ड्रेस्सिङ्ग टेबल उठाकर देवी के मुख के पास ले जाने की कौन सोच सकता है।
आजकल, एक कायदे के ड्रेस्सिङ्ग टेबल की कीमत भी तो 5000-10000
हो गई है।
कुछ भी हो, अगले वर्ष उनकी इच्छा पूरी करना तो बनता ही
है। मेरा विचार है एक छोटा शीशा मुख दर्शन के लिए तो लिया ही जाएगा। पंडित जी को
यथासंभव एक राशि दे दी जाएगी जिससे वे पंडिताइन की पसंद का “जमीन पर रखे वाला
सीसा” उन्हें भेंट कर सकें।
