Saturday, 4 November 2017

पान के पत्ते

घर में कथा का आयोजन था । नुक्कड़ के पानवाले से 11 पान के ताजे पत्ते 22 रुपये में खरीदे । महंगा लगा । कदम कुआँ पटना के फकरू चाचा याद आ गए । 6/4 फीट की पान दुकान में क्या कुछ नहीं मिलता था । टॉफी, बिस्कुट, पान, सिगरेट और न जाने क्या-क्या । फकरू चाचा के अलावे तीन जन और बैठते थे सूप लेकर बीडी लपेटते हुए । फकरू चाचा की दाढ़ी कभी सफ़ेद और कभी नारंगी कैसे हो जाती थी वे कभी नहीं बताते थे । अलबत्ता जल्दी रफा-दफा करने की खातिर खरीदे गए सामान के साथ एक टॉफी जरूर मिल जाती थी । 1950-60 के दशक में कथा का वृहत आयोजन होता था । एक बार पान के पत्ते लेने मुझे भेजा गया । फकरू चाचा ने संजीदगी से दोनों हाथ धोये और नयी डाली खोल कर बिना गिनती किये पान के पत्ते दोने में लपेट कर दे दिए । उन्हें मालूम था कितने अदद पान के पत्ते लगेंगे। तब पैसे से ज्यादा मोल रिश्तों का हुआ करता था । उन्हें प्रसाद में बाटें जाने वाला आटे का चूरमा बहुत प्रिय था।  मैं कुछ और पूछता उसके पहले मुझे ताकीद के साथ मेरी टॉफी मिल गयी थी ।

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