Friday, 26 February 2021

एक उदघाटन ऐसा भी !

 सिन्हा साहेब से मेरा परिचय बहुत पुराना है. १९६९ में जब मैंने नौकरी हासिल की तब ये ही मेरे वरिष्ठ अधिकारी थे- तेज़मिजाजी और खुशमिजाजी का नायाब नमूना. प्रोन्नति नहीं हुई थी इसलिए क्रोध इनके नाक पर रहता था. आज २०२१ में जब ये अकेले अपने ३ सुस्थित बच्चों के बीच आवाजाही करते रहते हैं तब ८८ की उम्र में न मालूम कब और कैसे तेज़मिजाजी लुप्तप्रायः सी हो गयी. पिछले वर्ष कोरोना काल के आरम्भ में जब इन्हें अकेलापन खलने लगा तब अपने पुराने संगी-साथियों की भीड़ टटोलने लगे. जब धुंध छटा तब मैं ही इनका मैन-फ्राईडे बना- फ्रेंड,फिलोसोफर, गाइड. हर रोज तरह-तरह की बातें होती है मोबाइल पर. मैं उन्हें पुरानी घटनाएं याद दिलाता हूँ. याद आये न आये पर मेरी यादाशत की दाद देते हुए सारी बात खूब मजे लेकर सुनते हैं. अगर कुछ टुकड़े याद आ गए तब बात बहुत दूर तक चल जाती है. इसके अलावा फुटबाल और क्रिकेट लाइव देखकर पोस्टमोर्टेम भी घंटा भर खींच लेता है. जाहिर है सेहत भी एक गुफ्तगू का मसला रहता होगा. अकेलेपन को धत बताने के लिए इससे बढ़िया पासटाइम भला और क्या हो सकता है.

सिन्हा साहेब सबसे ज्यादा खुशहाल अपनी २ बेटियों के पास रहने पर महसूस करते हैं. इस पर ज्यादा तवज्जो देने की शायद ही आवश्यकता हो. बेटा जेनेरल मेनेजर है और चाहता है कि पिता उसी के साथ रहे. पर कहाँ ओडिसा का एक सुनसान क़स्बा और कहाँ मुंबई और दिल्ली. ओडिसा में गर्मी भी भयानक पड़ती है. सबसे ज्यादा परेशानी इस बात की है कि  वे बहू से पर्दानशीन हैं. बेटे-बहू और उनके दो व्यसक होते लड़के अपने रोजमर्रे के शगल  से समय निकालकर सिन्हा साहेब की भरपूर सेवा करते हैं.. दोनों बेटी-दामाद रोजाना फोन पर बातें करते हैं. दोस्ताना और अकेलापन जब खलता है तब उसकी खानापूर्ति मुझसे बात करके पूरी करते हैं. कभी-कभी तुनक मिजाजी की चिंगारी फूटती है, जैसे बाजार दूर होने, बेहद गर्मी होने के कारण और कोविद होने के कारण बेचारगी जब हद से गुजर जाती है तब भी मैं याद आता हूँ. सब मिलाजुलाकर सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है. पर ऊपरवाले ने ये दुनिया सब कुछ ठीकठाक रहने के लिए कदापि नहीं बनायी है. आखिर वह भी एक वरिष्ठ सत्ता है. हमलोगों से आखिरी हद तक "पुरातन" है. हम वरिष्ठों से ज्यादा उसे अकेलापन खलता होगा. उसका भी तो मन लगना चाहिए.

सिन्हा साहेब का टीवी कुछ दिनों से परेशान कर रहा था.  मरम्मत करने वाले को दो-तीन बार बुलाया गया. अन्त में उसने भी हार मान ली. सिन्हा साहेब ने इंडिया-इंग्लैंड का पहला दोनो क्रिकेट टेस्ट मैच किसी तरह फटे रंग और आवाज के साथ देख लिया. २४ फरवरी को दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम का उदघाटन तीसरे टेस्ट मैच के साथ होना था. बहू पूजा कर रही थी. बेटा ऑफिस चला गया था – रात ९ बजे लौटेगा. पोता अपने लैपटॉप पर विडियो-स्टडी में भरपूर व्यस्त था.

सिन्हा साहेब सुबह से ३-४ बार फोन कर चुके थे. उन्हें भरपूर शक हो गया था की अनदेखी हो रही है. उन्होंने यहाँ तक मिजाज़ बना डाला कि अगर किसी तरह वे दुकान तक चले जाएँ तो चेक काटकर टीवी ले आयें. मैंने उन्हें इन्टरनेट से डाउनलोड कर उनके शहर की टीवी शोप्स के विवरण का स्क्रीन शोट्स भेजा. आजकल तो सब चीज़ों की होम डिलीवरी होने लगी है. उन्होंने उसकी मदद से एक-दो दुकानों से बात भी की पर कोई भी उसी दिन डेलिवेरी देने को तैयार नहीं हुआ. कुछ देर सिन्हा साहेब ने मेरे द्वारा भेजे गए हॉटस्टार लिंक को डाउनलोड कर मैच देखा भी. पर बड़े स्वोक्रीन का आनंद मोबाइल में कहाँ. हार कर, पूरी दुनिया को कोसते हुए, सिन्हा साहेब सिर तक चादर ओढकर लेट गए. नींद भी आ गयी.

नींद में उन्हें किसी के कमरे में आने की आहट मिली. शायद रात का ८ बज गया था. शायद ठंडी हुई चाय उठाकर भोजन की थाली रखी जा रही होगी. १० मिनट से ज्यादा हो गए. न किसी ने उन्हें उठाने की कोशिश की और न सिन्हा साहेब ने चादर की ओट से माजरा तौलने की ही कोशिश की. नाराज जो चल रहे थे. आज वे भोजन भी नहीं करेंगे.

तालियों के शोर ने सिन्हा साहेब को आखिरकार उठने को मजबूर कर दिया. देखा ! एक नया- नवेला  टीवी टेबल पर शोभायमान है और तालियाँ रोहित के चौके पर बज रही है. यह भी देखा की पोते के पीछे-पीछे आँचल लिए बहूँ भी दबे पाँव कमरे से बाहर निकल रही है.

रात ९.३० में सिन्हा साहेब का फोन आया. उनका गला रूंधा हुआ था.