Wednesday, 30 August 2017

रोबोट : मात्र मील का पत्थर !

आज फेसबुक पर आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस पर एक विडियो स्ट्रीमिंग देख हैरत में आ गया । यह विडियो भविष्य में रोबोट तकनीकी के विकास और उसके इस्तेमाल से सम्बंधित था । आश्चर्य तब हुआ जब अंत में यह दिखाई पडा कि 120 वर्षों में रोबोट-गिरी के चलते बेरोजगारी चरम सीमा पर पहुँच जायेगी और शायद सभी बेरोजगार हो जाएँ । ऐसी अफवाह तब भी फ़ैली थी जब कंप्यूटर का प्रसार-प्रचार हो रहा था ।
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विडियो में दिखाया गया है कि आने वाले 120 वर्ष में रोबोटिक इतना विकसित हो चुका होगा की मनुष्य को कोई कार्य करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी । शायद रोबोट मनुष्य पर हुकूमत भी चलाने लग जाए । आज के दिन अमेरिका और रूस रोबोट की लड़ने वाली फ़ौज बना रहे है जो जल-थल-वायु तीनो में अपनी ताकत से चकित और काफी आबादी को लाचार कर सकता है । चिकित्सा और अन्वेषण के क्षेत्र में तो हमलोग रोबोट की सहायता लेने ही लगे है ।
सुधिजन संभवतः रोजगार का सीमित अर्थ लगा बैठे हैं – काम के बदले पैसा - वह भी नौकरी-पेशे से सम्बंधित । आज से हजार वर्ष पहले भी और आज भी ऐसे रोजगारयाफ्ता आबादी का 10-15 % ही रहे हैं । स्वरोजगारी  और किसान की संख्या सभी देशों में काफी है । बेरोजगारी की बात हम तब कर रहे है जब इस पृथ्वी पर जितना कार्य इस समय दिख रहा है उसका 1% भी नहीं हो रहा है । कुछ तो हाथ में गिनाये जा सकते हैं और जिसमें कुछ में सफलता हासिल करने में ही सैकड़ों वर्ष लग जायेंगे- जैसे
·         गरीबी : विश्व की 80% आबादी गरीब हैं ।
·         सागर : 95% क्षेत्र का अन्वेषण बाकी है ।
·         पर्यावरण : अगले 120 वर्ष में बढ़ता तापमान और घटता ओजोन मात्र रोबोट को रास आयेगा ।
·         शिक्षा : विश्व की 26% जनसंख्या अभी भी अशिक्षित है ।
·         घर : लगभग १० करोड़ बेघर हैं और १६० करोड़ झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं ।

ऐसी सैकंडों समस्याएं और संभावनाएं हैं जिनके निदान में मानव-रोजगार की अटूट आवश्यकता है क्योंकि रोबोट को मानव जितना संवेदनशील बनने की संभावना कम ही दिखती है ।
संभवतः यह मात्र कपोल कल्पना ही हो की मानव अपने मस्तिष्क का मात्र 10% ही प्रयोग कर पाता है । यह सत्य है की आइंस्टीन जिन्हें जीनियस माना जाता है उनका मस्तिष्क आम मानव से 15% बड़ा था । इससे यह तो विदित होता ही है की हमलोग अवश्य मानते हैं की हमें अपने मस्तिष्क का पूरा 100% प्रयोग कर बहुत कुछ हासिल करना है । सर्वगुणसंपन्न भावी रोबोट भी हमारी 10% सक्रीय मस्तिष्क की देन है । कितनी अचम्भे की बात है की रोबोट मशीन जिसे मानव ने मानव के लिए बनाया है वह उस प्राकृतिक मानव पर हावी हो जाएगा जिसे प्रकृति ने प्रकृति के लिए बनाया है । रोबोट मानव सभ्यता के भविष्य का मात्र एक मील का पत्थर हो सकता है, मानव का मालिक नहीं । 
मानव अपनी कार्य दक्षता और ताकत बढाने के लिए सदियों से अस्त्र-शस्त्र, यंत्र-मन्त्र की सहायता लेता रहा है. पत्थर और गुलेल के समय से बढ़ते-बढ़ते हमलोग लेज़रगन और एटम बम की दुनिया से बहुत आगे बढ़ गए हैं,  
21वी सदी के अंत तक हमलोग STD बूथ पर लाइन लगाते थे आज घर बैठे विडियो पर बातें करते हैं । आज का स्मार्टफ़ोन कल अवश्य पुराना पड़ जाएगा । आज भारत जैसे देश में भी लगभग सभी के पास मोबाइल या स्मार्ट फ़ोन है । दस वर्ष पहले मात्र एक करोड़ हवाई यात्रा करते थे  । आज यह संख्या 10 करोड़ पार कर गयी है । कल नौकरीपेशे वाले आठ घंटे काम करके घर लौट आते थे । आज 16 घंटे आम बात हो गयी है । आज स्त्री-पुरुष मिलकर कमाते हैं फिर भी कमी खटकती ही है । आज 70-75 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक भी घर-बाहर या ऑनलाइन इन्टरनेट पर काम करता दिखेगा । अब न तो शाम की गोष्ठी दिखती है और न हुक्का-पानी । हाँ, “Made for Each Other”  के स्वप्न में खोये व्यक्ति के लिए सही रोजगार मिलने में देर भी है और अंधेर भी ।
मानव अपनी परिभाषा खो देगा अगर वह कर्मयोगी न रहा तो । स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर से लेकर रोबोट तक सभी उपकरण मानव की सुविधा के लिए बने हैं । जो कार्य दिख रहा है और जो दिखेगा उसके लिए ये सभी साधन अभी भी बहुत अपर्याप्त है लेकिन समयोपयोगी हैं । अभी तो मानव को पृथ्वी को पृथ्वी बनाना है - उत्कृष्ट बनाना है । उसके बाद कई दूसरे ग्रहों से मित्रता करनी है । अभी तो असंख्य सूर्य, अनगिनत तारे, कोटि-कोटि आकाश गंगाएं,अरबों ब्रह्माण्ड के बारे में जानना, समझना और संपर्क बनाए रखना बाकी है । और यह सब बिना नौकरी-पेशे और रोजगार के असंभव है ।
अभी जब मात्र 10% मस्तिष्क सर्वगुणसंपन्न रोबोट का निर्माण कर सकता है तो 100% मष्तिष्क का उपयोग तो मानव को सर्वशक्तिमान, सर्वभूत, सर्वज्ञ बना देगा- वह बना देगा जो निरंतर का कर्मयोगी है ।

मेरी तकनीकी-ज्ञानशक्ति यह भान करा रही है की आज से 120 वर्ष बाद धरती के मुश्किल कार्यों के लिए और अरबों प्रकाश वर्ष(1 light year=9 trillion Km) दूर के संधान के लिए मानव शारीरिक रूप में स्वयम नहीं शामिल होगा. यह सभी कार्य अतिसक्षम स्मार्ट रोबोट करेंगे. हमारी फोर डायमेंशनल मौजूदगी भर रहेगी. यह उपस्थिति क्वांटम टेलीपोर्टेशन(quantum teleportation) संभव करेगा. साथ ही हमलोगों को रोबोट को नियंत्रण में रखने की प्रणाली सुदढ़ करनी होगी जैसे लॉकिंग सिस्टम, पासवर्ड, गेट इत्यादि वह भी मानव हैकर्स को ध्यान में रखकर.
धरती की उम्रसीमा अरबों वर्ष है उसमें कुछ हजार मानव-वर्ष ही बीते हैं. यह मानव सभ्यता के आरंभिक क्षण हैं. 



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Tuesday, 15 August 2017

तिरंगा

बहुत वर्षों बाद , आज पुनः बच्चों को तिरंगा फहराते देखा । गौर करने पर बहुत सारे कारण याद आते हैं जिनके चलते राष्ट्रीय तिरंगा अपने भारतवर्ष में ही अजनबी बन गया । कोई शक नहीं आजादी मिलने के कुछ वर्षों तक तिरंगे की धूम रही होगी । 15 अगस्त 1955 के कुछ दिन पहले पटना के बी०एन०कॉलेज के 9 छात्र पुलिस फायरिंग में मारे गए थे । उससे आक्रोशित होकर स्वतंत्रता दिवस को किसी ने तिरंगे के बगल में काला झंडा लगा दिया था । लोगों ने शहीद हुए युवको का अपार दुःख होते हुए भी काला झन्डा फाड़ कर फेंक दिया था । 26 जनवरी और 15 अगस्त को मेरे घर पर तिरंगा फहराने की प्रथा 2000 तक पिताजी के स्वस्थ्य रहने तक कायम रही । इस प्रथा को लुप्त करने में हमारी पीढ़ी को पूर्णतः दोष दिया जा सकता है ।

मुझमें तिरंगे से बेरुखी का दोष कैसे पनपा बताना आवश्यक है । एक कारण तो साफ़ दिखता है  मैं इस तिरंगे को हर उन वाहनों पर देखता था जो ज्यादातर भ्रष्टता से लिप्त थे । तिरंगे के साथ-साथरगीन बत्तियांकमांडो एस्कॉर्ट्सवाहनों के काफिले से होने वाली यातायात असुविधा की बढती बाढ़ ने मुझे और भी तिरंगे से दूर कर दिया ।  साथ ही सब नेताओं के सर से गाँधी टोपी भी गायब हो गयी । शायद इन्हें भी शर्म आती होगी या फिर खूबसूरती में कमी होने का भय होगा महात्मा गाँधी, जिन्हें टॉलस्टॉय, आइंस्टीन, मार्टिन लूथर और आज भी मंडेला और ओबामा अपना आइकॉन मानते हैं , उस गाँधी और उनके स्मृति चिन्ह गाँधी टोपी को आज के नेताओं ने बड़ी उदासीनता से भुला दिया ।
इस लुप्तप्रायः तिरंगे और टोपी को गायब कर बेईमानी और भ्रष्टाचार ने भरपूर जगह बना ली है  भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है । सबसे ज्यादा दोषी सरकारी नौकरी-याफ्ता हैं । तिरंगा मात्र सरकारी भवनों की शोभा बढाता है । अब तो कुछ समुदाय और राजनीतिक पार्टियां भी तिरंगे का अपमान करने लगी हैं ।
आज जब मैंने कुछ बच्चों को तिरंगा फहरा कर जन-मन गाते और सलामी देते देखा तो मैंने अपने छोटे भाई के साथ प्रण किया की इस देशभक्ति उजागर करने वाले उत्सव को पुनः बहाल करने का प्रयत्न करूंगा- लोगों के मध्य सन्देश फैला कर और प्रधान मंत्री जैसे विश्वसनीय पोर्टल पर आग्रह कर । तिरंगा भारतीय पहचान का आधार कार्ड से भी ज्यादा शक्तिशाली बायोमेट्रिक होगा ऐसा मेरा विश्वास है ।  
इस दिशा में मेरा प्रयास सतत है  मैं जहां कहीं भी लोगों के साथ उठता-बैठता हूँ तिरंगे के प्रति  सुधिजन को  जागरूक करने का प्रयत्न करता हूँ । 

समय-समय पर सोशल मीडिया पर ब्लॉग के जरिये विचारों का आदान-प्रदान भी करता रहता हूँ  साथ ही ट्वीट भी करता रहता हूँ  मैंने "मेरी सरकार " पोर्टल के माध्यम से प्रधान मंत्री जी से भी प्रार्थना की है  ऐसे ही सबको कोशिश करनी चाहिए  बूँद-बूँद कर भी घड़ा भरा जा सकता है   आशा है वर्ष २०१८ के स्वाधीनता दिवस पर देशप्रेम प्रदर्शित करने के इस  अवसर का भारतीय नागरिक  भरपूर उपयोग कर गर्वान्वित होंगे 






Saturday, 5 August 2017

चोरी चोरी

बचपन की दुनिया खेलों की दुनिया थी । सोते-जागते बस एक ही बात उकसाती रहती थी और वह था दोस्तों के साथ मस्ती करना । कोई भी सुना या जाना हुआ खेल अछूता नहीं रहता था । कोना-कोनी, रूमाल चोर, चोर-सिपाही, आस-पास, पिट्टो, बम-बाल, लट्टू, इक्कट-दुक्कट, डोल-पात, कुछ ऐसे खेल थे जिन्होंने कब बचपन की दुनिया आँखों से ओझल कर दी मालूम ही नहीं पड़ा ।
बचपन और किशोरावस्था के बीच एक जोखिम भरा अंतराल था, शरारत से भर-पूर जहां “इग्नोरेंस इस ब्लिस” की हवा बहती थी । ऊँचे-ऊँचे पेड़ों पर चढ़ना, मुश्किल जगहों से फल चोरी करना, नदी-तालाब में बिना तैरना जाने छलांग लगा देना, भुतहे कहे जाने वाले धुप अँधेरे कमरे में चले जाना, और अपने से बड़ों और मजबूत कद-काठी लोगों से पंगा लेना आम बात होती थी ।

पिछवाड़े की गली से जब कभी स्कूल के लिए शोर्टकट लगाते तब राय महाशय के सात-आठ फीट ऊँची दीवार पर नुकीले शीशों से ढकी मुंडेर से झांकते कच्चे आम के टिकोरे बरबस ठहरने को और ललचाने को मजबूर कर देते । एक दोपहर , स्कूल से साथियों के साथ लौटते समय चढाई की योजना बन ही गयी । सबसे भारी-भरकम साथी के कंधे पर सवार होकर, नुकीले शीशे को मोटे बोरे से निरस्त्र कर, खूब सारा टिकोरा तोड़ भाग लिए । उसी दिन देखा की उनके बगीचे में अमरुद के पेड़ पर भी काफी कच्चे अमरुद लगे थे । एक दोपहरी हमलोगों का पूरा झुण्ड उसी तरह उनके बगीचे में उतर आया । एक डाल से दूसरे डाल, एक पेड़ से दूसरे पेड़ , दीवार के पास के सभी पेड़ों को खाने लायक अमरूदों से अनाथ कर, मात्र 5 मिनटों में हमलोग चलते बने । दूसरे दिन मेरे घर राय आंटी धमक गयी । उन्होंने मुझे बुलवाया । प्यार से सर सहलाया । शायद चूमा भी । मेरी माँ के सामने उन्होंने अमरुद और पके केले से भरा थैला मेरे सामने रख दिया और कहा-“ सब मिल बैठ के खाना ।हम और हमारा मिस्टर अकेले रहता है । कोई और नहीं है । जब भी मन करे हमारा बाड़ी आगे से आना और जितना चाहे अमरुद तोड़ना । मौसम में आम और लीची भी होता है ।” उन्होंने अमरुद की चोरी वाला काण्ड माँ को एकदम नहीं बताया ।
उसके बाद हमलोगों ने कभी भी उनके घर का रास्ता नहीं लिया ।शायद लज्जा आती हो या फिर एक दूसरा एडवेंचर राजेंद्र नगर आम बगान एन नजर आने लगा था । तब बात समझ में नहीं आयी थी , अब 60 वर्ष बाद समझ में आ गयी है । 

इस बरसात मेरे घर के पीछे वाली दीवाल से सटे हुए अमरुद के पेड़ पर ढेर सारे अमरुद लगे थे । घर के आउट हाउस में रहने वाले परिवारों के बच्चे स्कूल से लौटने के बाद पहला इंटरव्यू उन्ही दो अमरुद के पेड़ों का लेते ।एक दोपहरी मैंने देखा की उनमें सबसे छोटा 4 वर्ष का लड़का भी पेड़ पर चढ़ा हुआ था । वह गिर कर चोटिल भी हो सकता था । मुझे देखते ही सब फुर्र हो गए । उनलोगों को मैंने बाकायदा सीढ़ी चढ़ कर पेड़ तक जाने की इजाजत दे दी । एक-दो बार वे गए भी । उसके बाद न तो वे चोरी से अमरुद तोड़ते और न तो सीढ़ी से चढ़कर मेरी जानकारी में । उनलोगों की उदासीनता मुझे खलने लगी । डाल पर पककर अमरुद गिर रहे थे । शाम को मैंने देखा पूरा एक झुण्ड अमरुद की चोरी कर रहा था । ये झुण्ड तोतों का था । मैंने उनका नजदीक से स्नेप लेना चाहा । उनका शोर देखने और सुनाने लायक था । ऐसा लगता था की मैंने उनके क्षेत्र में सेंध मारने की कोशिश की हो ।
तभी बरबस मुझे मार्क ट्वेन के लिखी “एडवेंचरस ऑफ़ टॉम सॉयर” की याद हो आयी । उस किताब का सार ही था - जो मजा चोरी करके खाने में है... जितना जोखिम उतना मजा ...

  

Friday, 4 August 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता !

हम सभी वरिष्ठ नागरिक अपनी उम्र और स्वास्थ्य से ताल मिलाते हुए 3 से 8 किलोमीटर की सुबह की सैर के बाद कोई 7 बजे सोसाइटी के पार्क की बेंच पर बैठ थोड़ी गप-शप लड़ाने के लिए जुट जाते हैं । एक ग्रुप अवकाश प्राप्त पुलिस अधिकारियों का है और दूसरा मिला-जुला इंजिनियर-डॉक्टर और सिविल सर्विस का है । पहला ग्रुप 6-7 jजन का है और ज्यादा मुखर है । नोटबंदी के बाद तो जैसे पूरी तरह मोदी शासन के विरूद्ध हो गया है । उन्हें वर्तमान शासन की कोई भी बात पसंद नहीं आती । इस पक्षपातपूर्ण रवैये से बाकि उपस्थिति परेशान हो जाती है खासकर युवा वर्ग जो बेंच के सामने बने जॉगिंग ट्रैक पर प्राणायाम, योग और व्यायाम करते रहते हैं । मैं इन हंसों के बीच कौआ हूँ, कभी-कभी ही इस पार्क में आना होता है 
आज पुनः मोदी विरोधी वार्ता लम्बी खीच रही थी । डॉक्टर ने टॉपिक बदलने के लिए कहा तो बात चीन-भारत दोक्लाम सीमा विवाद पर आ गयी । पुलिस ग्रुप में से एक ने कहा की भारत में कहाँ दम है चीन से लड़ने का । भारत बात ही बनाता रहता है और चीन का बनाया सामान पूरी दुनिया में फ़ैल गया है । भारत-चीन सीमा पर चीन ने सड़कों की घेराबंदी कर रखी है । चीन तो अब अपनी विशाल दीवाल के नीचे सबसे लाबी मेट्रो ट्रैक की सुरंग बना रहा है । हमलोग चुपचाप चीन चालीसा सुन रहे थे और उन्हें भुगत रहे थे । सामने व्यायाम करते एक किशोर भी सुन रहा था । उससे रहा न गया ।
उस किशोर ने मुस्कुरा कर कहा –“ अंकल ! हमारे भारत में बोलने की आजादी है चीन में बोलने पर पूरी पाबंदी । समय की बर्बादी तो उनकी सोच के भी परे है ।चीन में 80 वर्ष से ऊपर के लोग भी योगदान करते दिखेंगे  खैर मनाईये आप चीनी नहीं है । चीनी होकर चीन के किसी पार्क में बैठ भारत की बडाई कर रहे होते तो अबतक आपको जेल में डाल दिया जाता । वहाँ कम्युनिस्ट शासन है । हमारा गणतंत्र भारत इतनी बड़ी आबादी के साथ, विविधता के साथ उन्नति कर रहा है जिसे पूरा विश्व आदर से देख रहा है ।
सबसे मुखर चौधरी जी को यह वाचालता अप्रिय लगी, साथ ही उनके अहम को आघात । उन्होंने कहा की इस उम्र में तो अब परिचर्चा ही मनोरंजन का साधन है नहीं तो तुम्हारी पीढ़ी कब घास डालती है ? इसका जवाब एक दूसरे युवक के पास था  । उसने आदर के साथ कहा–“अंकल ! बच्चों का साथ कीजिये । उन्हें पढ़ाइये, अच्छी बातें सिखाईये, हमलोगों से बेहतर इंसान बनाईये । हमलोगों को भी शामिल कीजिये 
कितना कुछ छिपा था इन वचनों में ! सत्य में भारत महानता की तरफ बढ़ता जा रहा है । हो भी क्यों नहीं जिस देश की 50% से अधिक की आबादी की उम्र 35 से कम हो और ऐसी समझ वाले किशोर हों ।
भविष्य में, पार्क कुछ रचनात्मक परिचर्चाओं का साक्षी बनेगा ऐसा विश्वास है ।