Sunday, 23 October 2016

शेयरिंग

आजकल दोपहरी बच्चों से गुलजार रहती है. कारण पिछवाड़े घर से सटा अमरुद का पेड़ है. बच्चे आउट हाउस में रहने वाले फार्म के कामगार के हैं जिनकी औरतें घर-घर बाई का काम करती हैं; मेरे घर भी. मजेदार बात है कि सब बच्चे इंग्लिश मीडियम के स्कूल में पढाई कर रहे हैं और ज्यादातर क्लास में अव्वल रहते हैं. पहले तो मन हुआ बच्चों को भगा दूं; दोपहरी की मीठी झपकी में खलल डालते थे. पर तब मुझे अपना बचपन याद आ गया. मुझे उनमें अपना बचपन दिखने लगा.


एक दिन मैं किसी काम से छत पर गया तो देखा 7-8 बच्चे अमरुद के पेड़ पर काबिज थे. कुछ तोड़ रहे थे, कुछ टहनियों पर बैठे खा रहे थे और छोटे बच्चे नीचे गिरे अमरूदों में खाने लायक ढूंढ रहे थे. मैंने ऐसे ही कह दिया कि एक-दो अमरुद मुझे भी देना. कुछ देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई. खोला तो देखा कुसुम ने फ्रॉक की झोली बनाकर 15-20 अमरुद जमा कर रखे थे. बिना कुछ कहे उसने जो सबसे अच्छे पांच अमरुद थे, चुन-चुन कर मुझे दे दिए. मैंने दो अमरुद लेकर बाकी उसे लौटा दिए. उसके बाद ये सिलसिला तबतक चालू रहा जबतक पेड़ पर अमरुद थे. एक ख़ास बात ये हुई कि बाकी भी जब-तब अपनी-अपनी झोली मेरे सामने फैला देते.

मैंने बच्चों में यह ख़ास तौर पर देखा है. वे अपनी सबसे अच्छी चीज शेयर कर आनंदित होते हैं. जैसे-जैसे समझ और हैसियत ऊचाई लेने लगती है तो ये नजरिया बगले झाँकने लगता है .

हमलोग भी शेयर करते हैं. जो भी कहानी, फोटो या जोक अच्छा लगता है उसे फेसबुक में या व्हाट्सएप्प पर. पर जब गिफ्ट का आदान-प्रदान होता है तो कभी-कभी ओछेपन से से बाज नहीं आते.