Friday, 4 November 2016

फिर वही !

सुबह सबरे 4-5 किलोमीटर की सैर के बाद घने पेड़ों से घिरे फूल-पत्तियों से सजे किसी खुले बड़े पार्क की बेंच पर सुस्ताने और जग का मुजरा देखने का आनंद ही कुछ और है । मेरे सैर का दायरा उम्मीदों से परिपूर्ण है । 8-10  पार्क है, खेलने का मैदान हैं , पास ही गाँव का फैलाव है और उसको चीरती रेलगाड़ियों का नजारा है और है हर सुबह उगता एक नया सूर्य कभी बादलों के संग कभी नीले आकाश को बहुरंगी बनाता. सुर्ख लाल से नारंगी और फिर दमकता चमकता .-जायका-फरोशी के लिए । पार्क में कम उम्र जॉगिंग और व्यायाम करते, महिलाए दो-तीन के ग्रुप में बतियाते और चक्कर लगाते एवं मेरे जैसे अकेले-दुकेले घूमते, प्राणायाम  करते या बेंच पर बैठ गप्पें लड़ाते दीखते रहते हैं ।


मुझे अकेले बैठना और कुछ नहीं तो आकाश में घुलते-मिलते बादल और उनमे से झांकता सूरज निहारना ज्यादा रुचिकर लगता है । चिड़ियों की चहचाहट कानों को ज्यादा प्रिय लगती है ।  मेरे हमउम्र मुझे जांचते-परखते गुजरते रहते हैं । कभी -कभी किसी का साथी रिपोर्ट नहीं करता है तो लाचारन उन्हें मेरे बेंच पर बैठने की जगह दिख जाती है । मैं एक अच्छा श्रोता हूँ । इसका फायदा ऐसे महानुभावों को मिल जाता है । फिर वही 50-60 वर्ष पुरानी दास्ताँ या फिर नौकरी- पेशे की शेखी छौंक-बघार के साथ  । मेरा 10-15 मिनट का बैठना एक घंटे के ऊपर फ़ैल सा जाता है ।अगर उसके बाद किसी दिन फिर ऐसी ही बैठक होती है तो फिर वही बीती बातों का दोहराना तिहराना ।  मजबूरन मैं किसी दूसरे ठिकाने जा बैठता हूँ ।  इससे 10-12 दिन की मोहलत मिल ही जाती है । फिर वही सिलसिला । कितना अच्छा होता जो बजाय बीती बातें बतियाने के हमलोग स्वाध्याय करते चाहे आध्यात्मिक या प्राकृतिक ।

1 comment:

  1. बहुत सटीक वर्णन।सौभाग्यशाली है नजदीक में इतना सुन्दर पार्क और रमणिक वातावरन,साथ में सही सलामत बेन्च।सुबह की शुरुआत इतनी हसीन हो तो दिन अगले दिन के इन्तजार मे कट जाता होगा।

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