रात होने को आयी थी. हावड़ा मुंबई मेल के स्लीपर क्लास में सभी मनहूस जैसे लेटे
हुए नींद आने का इन्तजार कर रहे थे.न कोई किसी से बात कर रहा था और न तो कोई सामान
बेचने वाला ही हल्लागुल्ला कर रहा था. बात छेड़ने के लिहाज से एक बुजुर्ग ने अपने
ऊपर वाले बर्थ पर लेटे युवक से पूछा – “ लगता है मैंने आपको पहले भी कहीं देखा है आप कहां जा रहे हैं.“
युवक बोला – “मैं अपने घर इलाहाबाद जा रहा हूँ. “
बुजुर्ग ने कहा – “अरे ! इलाहाबाद तो मैं भी जा रहा हूँ. वहां आप कौन सी जगह रहते हैं. “
मैं अतरसूईया में रहता हूँ.- युवक बोला.
वाह ! मैं भी वहीं रहता हूँ. – बुजुर्ग चहकने लगा – अतरसूईया में कहाँ रहते है.
बस पानी टंकी वाले पार्क के बगल में- युवक ने जवाब दिया.
अरे ! वहीं बगल में आटा चक्की वाला घर मेरा है – बुजुर्ग अब सजग हो आया.
मैं भी तो उसी घर के ऊपर छत वाले कमरे में रहता हूँ – युवक में भी बेसब्री आ रही
थी .
सभी जगे हुए और जिन्हें नीद आ चुकी थी पर अब जग चुके थे नींद के झोंको से
अनजान हो चुके थे. पर सबसे ज्यादा खीज तो सामने पसरे बूढ़े को आ रही थी . वह
गुर्राया – ऐसा कैसे हो सकता है कि आप दोनों एक ही घर में रहते हों और अभी तक आप लोग एक दूसरे
से अनजान हों.
बुजुर्ग बोला – ऐसा नहीं है ! बात करते रहने से नींद आ जाती है हमलोगों को. हमलोग बाप-बेटे
हैं.
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