Thursday, 5 February 2015

ये दुनिया या वो दुनिया !


आज सुबह तडके जब मैं तालाब के किनारे बत्तकों को रोटी खिलाने पहुंचा तो भौचक रह गया. आज न तो बत्तकें दौड़ती हुई मेरे पास आ यी, न कोई उड़कर मेरे बगल में पहुंचा और न किसी ने पीछे से चोंच मारकर अपनी मौजदगी बतायी.
मुझे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर जो सबसे सुखद क्षण बिताने का मौक़ा मिलता है वह या तो बच्चों के साथ या फिर प्रकृति के विभिन्न आयामों के साथ. गो कि सूर्योदय और सूर्यास्त मैं कभी चूकना नहीं चाहता पर मुझे आकाश और उसपर छाये बादल तक हमेशा बहलाते रहते हैं. पेड-पौधे, उनके पत्ते, पत्तों से छनकर आती धूप की किरणे, रंग-बिरंगे फूल कभी भी रोमांचित करते रहते हैं. पर जब कोई पशु या पक्षी अपनापन दिखलाने लगता है तब मुझे यह अहसास होने लगता है कि प्रकृति भी मुझे अपना दोस्त मानती है. उसी कड़ी में , मैं कभी तालाब की मछलियों से नजदीकी करता हूँ, कभी गिलहरियों  को मूंगफली खिलाकर दोस्ती करता हूँ तो कभी बत्तकों को रोटी खिलाकर गौरवान्वित महसूस करता हूँ.

मैं इस तालाब के पास रहने को कुछ महीनों के लिए आया हूँ और जल्दी ही इससे दूर चला जाऊंगा. जैसे जैसे वापिस जाने का दिन नजदीक आता जा रहा है, मैं इस सोच से परेशान हूँ कि ये बत्तकें मेरे जाने के बाद मेरा इन्तजार करती रहेंगी.
पर आज जो दो-चार बत्तकें बड़ी मुश्किल से मेरे पास आयी और रोटी के टुकड़ों को अपनी चोंच में लिया, वे सभी अनजानी बत्तकें थीं.
लौटते वक्त, इतनी छोटी पर इतनी गहरी बात मेरी समझ में आयी. मेरी दोस्त बत्तकों ने अब अपना कोई दूसरा आशियाना ढूंढ लिया था या फिर आज माघ पूर्णिमा के दिन उनके लौटने का दिन हो आया था. और अब इस तालाब में किसी दूसरे जगह से नयी बत्तकें आ जायेंगीं.

अब मुझे भी ये जगह छोड़कर अपने वतन वापिस लौटने में ज्यादा दुःख नहीं होगा.

दिनांक : 04.02.2015

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