जो बातें शहर के लिए आम हैं वह गाँव के लिए खास हो जाती हैं। इसी तरह गाँव की आम बातें शहर के लिए खास हो जाती है। जब आम के पेड़ में बेशुमार मंजर आते हैं और मंजर टिकोरों(कच्चे आम) में परिवर्तित हो बड़े होने लगते हैं और जब आँधी-तूफान आकर आम के पेड़ों का बोझ हल्का कर देते हैं तब गाँव में कोलाहल नहीं मचता। रखवाले अपने-अपने बगान के टिकोरे जमा कर लेते हैं । उनका व्यंजन व आचार में भलीभाँति उपयोग हो जाता है। आजकल शहर में किसी-किसी के ही घर के बाड़े में जमे इकलौते आम के पेड़ इस तरह की मस्ती दिखा पाते हैं। अगर उस घर में बच्चे हुए या अड़ोस-पड़ोस में बच्चे हुए तो हँगामा बरप जाता है। मेरे ललाट पर कटीले तार से बनी लकीर अब तक कामयाब है। तब बहुत खून बहा था। पड़ोस के बाड़े में बहुतेरे टिकोरे गिरे थे।
आजकल लोकडाउन में बस जरूरत की सब्जी घर आती है। 5 किलोमीटर दूर पश्चिम के गाँव पुनदाग से औरतें , टोकरा भर सब्जी सिर पर लादे, पुलिस से छिपते-छिपाते रेल लाइन के किनारे चलते हमारी सोसाइटी में आ जाती हैं। जल्दी से पर महंगी सब्जी बेचकर भाग निकलती हैं। कुछ भी कहिए बहुत दिनों बाद ताज़ी सब्जी खाने को मिलने लगी है। अब इसमें कच्चे आम, पुदीना और धनिया की चाह करना तो नादानी होगी।

कच्चे आम के मौसम में मेरे घर का सबसे सुस्वादु पकवान(delicacy) है कच्चे आम की खट्टी-मीठी, या गुरममा। इसे तेजपत्ते, पंचफोरन और लाल मिर्च के तड़के पर गुड़ में बनाया जाता है। उसके साथ मेल खाता चने दाल की दलभरी(भरुवा परोंठा) परोसे जाने के पहले ही भूख बढ़ा देता है। श्रीमति बहुत निपुणता से इन्हे बनाती है। मैं बचपन से इसका शौकीन हूँ। ननिहाल में मेरी आवभगत इसी से होती थी। माँ मेरे लिए बड़े चाव से बनाती थी। अब भी मन उसी तरह ललचा जाता है। पर कच्चे आम कहाँ से मिले। घर से सटे आम के पेड़ में बहुत टिकोले लगे हैं पर इस पेड़ के पके आमों का तो जवाब नहीं।
कल बिल्ली के भाग से छिंका टूटा। बहुत ज़ोर की आँधी के साथ बारिश आई। मेरे घर के पिछवाड़े लगे आम के पेड़ से बहुत से टिकोरे गिरे। आधे घंटे बाद बारिश-आँधी रुकी। उतनी देर हम मिया-बीबी और आउटहाउस के बच्चे दरवाजे खोल बारिश रुकने का इंतजार कर रहे थे।
उसके बाद वह हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। हम दोनों और आउटहाउस के बच्चे साथ-साथ दौड़े टिकोरे चुनने। पर बच्चों के सामने हमलोगों की क्या बिसात। तय हुआ की आधा-आधा बाँट लिया जाए।
कोरोना ने हम बुजुर्गों का बचपना लौटा दिया है।
आजकल लोकडाउन में बस जरूरत की सब्जी घर आती है। 5 किलोमीटर दूर पश्चिम के गाँव पुनदाग से औरतें , टोकरा भर सब्जी सिर पर लादे, पुलिस से छिपते-छिपाते रेल लाइन के किनारे चलते हमारी सोसाइटी में आ जाती हैं। जल्दी से पर महंगी सब्जी बेचकर भाग निकलती हैं। कुछ भी कहिए बहुत दिनों बाद ताज़ी सब्जी खाने को मिलने लगी है। अब इसमें कच्चे आम, पुदीना और धनिया की चाह करना तो नादानी होगी।

कच्चे आम के मौसम में मेरे घर का सबसे सुस्वादु पकवान(delicacy) है कच्चे आम की खट्टी-मीठी, या गुरममा। इसे तेजपत्ते, पंचफोरन और लाल मिर्च के तड़के पर गुड़ में बनाया जाता है। उसके साथ मेल खाता चने दाल की दलभरी(भरुवा परोंठा) परोसे जाने के पहले ही भूख बढ़ा देता है। श्रीमति बहुत निपुणता से इन्हे बनाती है। मैं बचपन से इसका शौकीन हूँ। ननिहाल में मेरी आवभगत इसी से होती थी। माँ मेरे लिए बड़े चाव से बनाती थी। अब भी मन उसी तरह ललचा जाता है। पर कच्चे आम कहाँ से मिले। घर से सटे आम के पेड़ में बहुत टिकोले लगे हैं पर इस पेड़ के पके आमों का तो जवाब नहीं।
कल बिल्ली के भाग से छिंका टूटा। बहुत ज़ोर की आँधी के साथ बारिश आई। मेरे घर के पिछवाड़े लगे आम के पेड़ से बहुत से टिकोरे गिरे। आधे घंटे बाद बारिश-आँधी रुकी। उतनी देर हम मिया-बीबी और आउटहाउस के बच्चे दरवाजे खोल बारिश रुकने का इंतजार कर रहे थे।
उसके बाद वह हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। हम दोनों और आउटहाउस के बच्चे साथ-साथ दौड़े टिकोरे चुनने। पर बच्चों के सामने हमलोगों की क्या बिसात। तय हुआ की आधा-आधा बाँट लिया जाए।
कोरोना ने हम बुजुर्गों का बचपना लौटा दिया है।
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