आजकल, कोरोना संक्रमण के दौरान फोन बहुत ही कामयाब जरिया हो गया है समय बिताने का । उनके लिए तो जैकपोट है जो किसी कारणवश घर से दूर कहीं अटके हुए हैं। मेरे एक मित्र ग्रेटर नोएडा के अपार्टमेंट की छठी मंजिल पर अवस्थित हैं। जब लॉकडाउन नहीं था तो उससे बेहतर जगह कोई नहीं थी। पटना के एक मित्र डेहरी के पास किसी गाँव में नजरबंद हैं। बहन की ससुराल है इसलिए सारा समय ऊहापोह में गुजार रहे हैं। सबसे आनंद मे सिन्हा साहब हैं। मुंबई के ईस्ट मुलुंड में 14वी मंजिल पर अपनी बेटी और दामाद के साथ। सभी तरह का आराम है। अब उम्र 85 के पार है तो जरूरतें भी कम ही होगी सिवाय तबीयत चंगी रखने के। जैसे स्वर्ग में इंद्र और अन्य देवताओं को भी रह-रह कर बैचेनी होने लगती है वैसे ही सिन्हा साहब भी आजकल थोड़े अटपटे हो गए हैं। कारण उन्हे खैनी-गुटका की आदत है जो 3 दिन से खत्म हो गया है।
आज सुबह 9.30 बजे, जब सब कोई टीवी पर रामायण देखने में व्यस्त थे तब उन्हे मौका मिल ही गया। चुपके से, उसी पाजामे,कुर्ते और चप्पल में बाहर का दरवाजा बहुत धीमे से खोल और चाभी लेकर निकल पड़े। लिफ्ट से नीचे उतरे। एक फरलांग दूर गेट के पास पहुंचे। कैबिन में बैठा गार्ड चौकन्ना था। बिहारी था। उसने रोका। भोजपुरी में बतियाने पर जल्दी ही मेलजोल हो गया। तय हुआ की सिन्हा साहब कैबिन में बैठेंगे और वह मोड के पान दुकान से खैनी , गुटका, पुड़िया जो भी मिलेगा थोक में ले आएगा। 500 रुपये लेकर चला। आधे घंटे बाद खाली हाथ लौटा। कोई भी काम की दुकान खुली न थी। गार्ड के पास पैसे छोड़ चले आए। जब भी मिले, आते-जाते जहां भी मिले। इंटरकॉम पर इशारा मिलते ही लेन-देन फिक्स होना था।
सिन्हासाहब थोड़े निराश, थोड़े प्रसन्न, लिफ्ट से 14वी मंजिल आकर हौले से चाभी लगा दरवाजा खोला। पर ये क्या ? सामने उनकी बेटी और दामाद खड़े मिले। बेटी ने छूटते ही कहा – पापा ! गार्ड से फोन कर हमने सब मालूम कर लिया है। बाहर ही कपड़ा उतार कर टॉवल लपेटिए और सीधे बाथरूम जाकर डेटॉल और साबुन से नहा लीजिये।
यह सब सिन्हा साहब ने एक घंटे बाद मुझे सविस्तार बताया।
आज सुबह 9.30 बजे, जब सब कोई टीवी पर रामायण देखने में व्यस्त थे तब उन्हे मौका मिल ही गया। चुपके से, उसी पाजामे,कुर्ते और चप्पल में बाहर का दरवाजा बहुत धीमे से खोल और चाभी लेकर निकल पड़े। लिफ्ट से नीचे उतरे। एक फरलांग दूर गेट के पास पहुंचे। कैबिन में बैठा गार्ड चौकन्ना था। बिहारी था। उसने रोका। भोजपुरी में बतियाने पर जल्दी ही मेलजोल हो गया। तय हुआ की सिन्हा साहब कैबिन में बैठेंगे और वह मोड के पान दुकान से खैनी , गुटका, पुड़िया जो भी मिलेगा थोक में ले आएगा। 500 रुपये लेकर चला। आधे घंटे बाद खाली हाथ लौटा। कोई भी काम की दुकान खुली न थी। गार्ड के पास पैसे छोड़ चले आए। जब भी मिले, आते-जाते जहां भी मिले। इंटरकॉम पर इशारा मिलते ही लेन-देन फिक्स होना था।
सिन्हासाहब थोड़े निराश, थोड़े प्रसन्न, लिफ्ट से 14वी मंजिल आकर हौले से चाभी लगा दरवाजा खोला। पर ये क्या ? सामने उनकी बेटी और दामाद खड़े मिले। बेटी ने छूटते ही कहा – पापा ! गार्ड से फोन कर हमने सब मालूम कर लिया है। बाहर ही कपड़ा उतार कर टॉवल लपेटिए और सीधे बाथरूम जाकर डेटॉल और साबुन से नहा लीजिये।
यह सब सिन्हा साहब ने एक घंटे बाद मुझे सविस्तार बताया।
मज़ेदार!
ReplyDeleteयाद आया . एक मौलवी साहब थे . रोज़ा के दिनो में प्यास लगती तो पास के तालाब में नहाने चले जाते, डुबकी लगाते , जी भर पानी पी लेते और बाहर आ कर क़सम खाते की पानी की एक बूँद भी हराम है .
एक दिन गले में मछली अटक गयी और चोरी पकड़ी गयी.
सिन्हा साहब को नही मालूम ?