पहले के घरों में एक आँगन होता
था,
एक बरामदा होता था और एक गलियारा होता था । दोपहर में क्रिकेट खेलने
के लिए गलियारा सबसे अच्छा होता था; बस स्ट्रेट ड्राइव की
गुंजाईश; एक आध फील्डर की जरूरत । हमारे घर में गलियारे के शोर्ट कवर में जज अंकल का लिविंग रूम था ।
टेनिस की गेंद उनकी दीवार या खिड़की छूती भर थी और हंगामा शुरू । ऐसा दिन महीने में
एक-दो बार ही आता था की शोर्ट कवर पर हंगामाँ गैरहाजिर हो ।
आज के दिन खेलने का मैदान, बरामदा, गलियारा
नसीबवालों की डेलिकेसी हो गयी है । ऐसे में घर के बच्चों को मेरे घर का अगवाडा ही बच्चों को सबसे रास आया दोपहर के क्रिकेट के लिए । मेरे घर की लम्बी-चौड़ी खिड़की बल्ले के
स्विंग से 3 फीट दूर है । उसपर यह मेरे आराम का समय होता है । दोपहर को स्कूल से
लौट कर बच्चे क्रिकेट के साथ-साथ स्कूल की आपबीती भी गपियाते रहते हैं । खेल तभी
ख़त्म होता है जब बच्चे अपने जन्मसिद्ध अधिकार का उपयोग करने लगते हैं; यानी
झगडा !
शुरू में एक-दो बार जब बाल
खिड़की से टकराई तो मैंने दांत तोड़ लेने की धमकी भी दे डाली । उसकी बाद कुछ दिन तक
दारुण सन्नाटा । दोपहर को नींद की झपकी आनी बंद । मालूम पडा मेरे डर से कम बल्कि
गेंद फट जाने से खेल बंद है । मैं शाम को बाजार जाकर उनके लिय गेंद ले आया ।
अब उनकी बातूनी नोक-जोख से
भरपूर क्रिकेट की लोरी क्या गजब की झपकी ला देती है । उसके सामने 2-3 सौ के खिड़की
के शीशे की क्या हैसीयत !

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