Wednesday, 9 May 2018

हम भी कभी बच्चे थे !

पहले के घरों में एक आँगन होता था, एक बरामदा होता था और एक गलियारा होता था । दोपहर में क्रिकेट खेलने के लिए गलियारा सबसे अच्छा होता था; बस स्ट्रेट ड्राइव की गुंजाईश; एक आध फील्डर की जरूरत । हमारे घर में गलियारे के शोर्ट कवर में जज अंकल का लिविंग रूम था । टेनिस की गेंद उनकी दीवार या खिड़की छूती भर थी और हंगामा शुरू । ऐसा दिन महीने में एक-दो बार ही आता था की शोर्ट कवर पर हंगामाँ गैरहाजिर हो ।

आज के दिन खेलने का मैदान, बरामदा, गलियारा नसीबवालों की डेलिकेसी हो गयी है । ऐसे में घर के बच्चों को मेरे घर का अगवाडा ही बच्चों को सबसे रास आया दोपहर के क्रिकेट के लिए । मेरे घर की लम्बी-चौड़ी खिड़की बल्ले के स्विंग से 3 फीट दूर है । उसपर यह मेरे आराम का समय होता है । दोपहर को स्कूल से लौट कर बच्चे क्रिकेट के साथ-साथ स्कूल की आपबीती भी गपियाते रहते हैं । खेल तभी ख़त्म होता है जब बच्चे अपने जन्मसिद्ध अधिकार का उपयोग करने लगते हैं; यानी झगडा !

शुरू में एक-दो बार जब बाल खिड़की से टकराई तो मैंने दांत तोड़ लेने की धमकी भी दे डाली । उसकी बाद कुछ दिन तक दारुण सन्नाटा । दोपहर को नींद की झपकी आनी बंद । मालूम पडा मेरे डर से कम बल्कि गेंद फट जाने से खेल बंद है । मैं शाम को बाजार जाकर उनके लिय गेंद ले आया ।
अब उनकी बातूनी नोक-जोख से भरपूर क्रिकेट की लोरी क्या गजब की झपकी ला देती है । उसके सामने 2-3 सौ के खिड़की के शीशे की क्या हैसीयत !



No comments:

Post a Comment