मेरा अन्तरंग मित्र लक्ष्मी
रांची आया था, मुझसे भी मिलने दो वर्ष के
अंतराल के बाद । आते ही उसकी तबियत ख़राब हो गयी । रांची की बिन बताये झमक पड़ने
वाली पहाड़ी बरसात धमका रही थी । बादलों के झरोखे से कभी-कभी
धूप छनकर आ रही थी । आखिर हिम्मत करके घर से
निकला । लक्ष्मी आठ किलोमीटर दूर रहता था । रास्ता मेन रोड बाजार से होकर पुराने
जेल रोड जाता था और उसके बाद करम टोली । बाजार पहुँच कर मैंने एक जवान आदिवासी
रिक्शेवाले की सवारी कर ली । पानी बरसने लगा था । उसने हुड फैला दिया ।
मैंने अपना छाता उसे दे दिया ।
अब जेल रोड का जेल शहर के
सरहद पर चला गया है । उसकी जगह एक पार्क तैयार किया जा रहा था । जेल और उसकी
चाहरदीवारी अभी भी कायम थी । मेरे मित्र के पिता 1970 के दशक में रांची जेल के असिस्टेंट जेलर हुआ करते थे ।
कॉलेज का रास्ता इधर से ही होकर गुजरता था, जाहिरन मैं हफ्ते में एक-दो बार लक्ष्मी के घर बतियाने और जलपान करने
रुक जाया करता था । जेल की चाहरदीवारी के बाहर चारो और बहुत सुन्दर नयी
चाहरदीवारी बना दी गयी थी जिसपर झारखण्ड की संस्कृति और वन्य प्राणियों की
टाइल्स पर मनोहारी चित्रकारी भी चुन दी गयी थी ।
मैं शारीरिक श्रम से चलने
वाले रिक्शे पर आदतन नहीं बैठता हूँ । अपराध भावना घर करने लगती है । अब चुकी उम्र
की गुजारिश थी और बरसते पानी में दूर तक जाना था इसलिए मजबूरन इसकी सहायता लेनी
पड़ी । सड़क समतल थी । मैंने अपना और रिक्शेवाले का मन लगाने के लिए बातों का
सिलसिला छेड़ दिया ।
मैंने पूछा- “ऑटोरिक्शा क्यों नहीं ले लेते बैंक से लोन लेकर । आजकल तो लोन लेना
बहुत आसान हो गया है ।”
उसने बताया –“लोन में बैंक
वाला बहुत परनामी ले लेता है और सूद भी लगते रहता है । उसके बाद पुलिस और रंगदार
लोग भी रोजाना वसूली करता है । रिक्शा अपना है । रोजाना 250-300 रुपया का कमीनी हो जाता है ।“
मैंने बात आगे बढ़ाई, पूछा – “क्या तुम्हारे बच्चे भी
रिक्शा चलाएंगे ?”
उसने कहा कि अभी उसके बच्चे
नहीं हैं । जब होंगे तो उनको पढ़ा-लिखा कर साहब बनायेंगे ।
उसकी उम्र पैतीस रही होगी ।
मुझे उसकी परेशानियों में ज्यादा झांकना उचित नहीं लगा । मैंने बात बदलते हुए उससे
कहा कि मैं जिस दोस्त के पास जा रहा हूँ उसके पिता इस जेल के जेलर थे ।
मुझे अचम्भा तब हुआ जब उसने
पूछा कि उनका नाम क्या था और किस समय थे । मैंने बताया कि वे 1970-80 के समय इस जेल में पोस्टेड थे । आगे उसने जो बताया
उसी के लिए यह लिखना पड़ा ।
वह 1997 से लेकर 2010 तक जेल में कैदी की तरह रहा । कैदी कि तरह इसलिए कि न तो उसने जुर्म
किया था, न उसकी वकालत किसी ने की ।
उसे सजा भी हुई तो मात्र छ महीने की । पर उस सजा के फैसले के लिए उसे
१२ वर्ष से ज्यादा जेल में रहना पड़ा । उसने बताया कि वह सूरज उगने के पहले
पांच मील की दौड़ लगाता था । जिला के मैराथन में हिस्सा लेता था और हॉकी का अच्छा
खिलाडी था । एक सुबह वह चोर-चोर की आवाज सुन दौड़ता हुआ रुक गया । पकड़ा गया । थाना
हाजिर हुआ । उसके बाद १२ वर्षों से ज्यादा जेल में रहा । खेल से भी गया, जेल के बाद कही नौकरी भी नहीं मिली ।
रिक्शा अब दाहिना मोड़ लेकर
सर्कुलर रोड पर विमेंस कॉलेज की तरफ जा रही थी । उसने दाहिने, जेल की १५ फूट ऊँची दीवारों से झांकते पेड़ों की और दिखाया और कहा-“ वो सभी पेड़ हमलोगों ने लगाया था । अब कितना बड़ा हो गया है । उधर कोने में हम मेस
में काम किया करते थे । हम जेल नहीं जाते
तो बच्चा बना लेते । मालूम नहीं जेल का रोटी में इ लोग कौन सा करंट मारता है ।
सबकुछ ठीक है पर बच्चा नहीं बनता है ।“
बातों-बातों में मैं भी गलत
रस्ते की भेंट चढ़ गया था । मैं भी तो पांच वर्षों बाद इधर आया था । उसने मुझे
हिम्मत दिलाई और घर खोजने में मेरी मदद करने की बात कही । मैंने उसे मना कर दिया ।
वह मुझसे इस मेहनत का पैसा नहीं लेता ऐसा मुझे लगा ।
रांची बहुत बदल गया है ।
आदिवासी अभी भी वैसे ही भोले-भाले हैं ।
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