Wednesday, 6 April 2016

सुबह के साथी

21वी सदी ने कदम रखते ही पुणे जैसा जीवन्त शहर मेरी झोली में डाल दिया। बच्चों की पढ़ाई और उसके बाद नौकरी , पुणे आना-जाना लगा रहता है। वैसे रांची और पुणे का क्लाइमेट बहुत कुछ मिलता जुलता है । पुणे दो बातों में रांची से अलग है । अव्वल तो इसमें मुम्बई महानगर की छाप एकदम झलकती है । दूसरे यहाँ लोगबाग़ अमन पसंद हैं । कभी-कभी तो ऐसा महसूस होता है कि शहर का पाषाण इलाका सीनियर सिटीजन के इर्द-गिर्द रचा-बसा है । सुबह सबेरे बुजुर्गों की सैर से सभी इलाका गुलज़ार हो जाता है । सुबह की यह वर्जिश अब रांची में भी दिखती है पर शुरूआती झिझक के साथ ।
पुणे में पूरा शहर सुबह घर के बाहर दीखता है । कमउम्र ज्यादातर जॉगिंग कर रहे होते हैं तो महिलायें बात करती अपना टारगेट तय करती हैं । बाशिंदे बुजुर्ग ग्रुप में हॅसते हँसाते बैठकी लगाते सुबह के स्वर्ग का भरपूर आनंद लेते हैं । मेरे जैसे विजिटर या तो अकेले या बीबी के साथ घूमते दिखेंगे । गर्व होता है उन बुजुर्ग महिलाओं और महाशयों पर जो शारीरिक रूप से कमतर हैं पर हौसला बुलंद बनाये हुए हैं । सबसे अच्छा लगता है इन सुबह के साथियों का पहनावा । युवक-युवतियों और महिलाओं से कदम ताल मिलाते बुजुर्ग मर्द भी कोई कसर नहीं छोड़ते हैं; रंगीन प्रिंट वाले टी शर्ट, हाफ या ¾ पैंट, सर पर मैचिंग कैप और लेटेस्ट स्पोर्ट या जॉगिंग जूते । थोड़ी और कमअक्ल होती तो मैं भी काम्प्लेक्स से बोझिल हो जाता । खैर एक बदलाव तो तुरत आ गया । कई दिनों से मेरा बेटा मुझे स्पोर्ट्स शू लिवा देने की मशक्कत कर रहा था । मेरी झिझक देख उसने अपना नया जूता आजमाने के लिए कहा । सच में , उसे पहन कर सुबह की सैर का लुत्फ़ दुगना हो गया । अब बेटे को शुक्रिया मुझे अपने अंदाज में देना था । मौका मिल ही गया ।
वह अपने दोस्तों के साथ दो दिनों के लिए गोआ घूमने गया । किसी काम से मैंने उसका वार्डरोब खोला तो उसके बेतरतीब ढंग से ठूंसे कपडे भरभरा कर बाहर गिर पड़े । पूरे दो घंटे लगे उसे ठीक करने में । 20 से ज्यादा तो टी शर्ट ही मिले ।
अगली सुबह मैंने उस खजाने से एक एडिडास की टी शर्ट पहन सैर को निकला । ऐसा महसूस  होता रहा कि सबकी निगाहें मुझी पर हैं । लौटने के पहले गिरमे पहाड़ी के पास के बेंच पर थोड़ी देर सुस्ताने बैठ गया । आज मेरी नजर खासकर हमउम्र लोगों के पहनावे पर थी । अब मुझे उनके चटकदार पहनावे का राज समझ में आने लगा । इनमें से बहुतों की जिंदगी मेरी जैसी ही होगी ।
कॉलेज जाने की उम्र में मेरे बेटे का डील डॉल मेरे जैसा ही था । जरूरत और मौके के अनुसार वह मेरे कपडे व् जूते पहन लिया करता । एक दो तो उसे इतने पसंद आते की मांग ही लिया करता । ईश्वर ने प्रत्येक कर्म को साइक्लिक रखा हुआ है । कहीं भी पसंगा या भूल-चूक-लेनी-देनी की गुंजाइश नहीं छोड़ी है ।

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