Thursday, 9 April 2015

मोन्टा रे !!!

आज दिल में लगे स्टेंट की ओर्फिस ठीक खुली हुई थी. अस्थमा भी संयमित था. तो सुबह की सैर थोडा ज्यादा मांग करने लगी. घर से दो किलोमीटर दूर पश्चिम में 700 मीटर ऊंची पहाड़ी पर तैयार होता बायोडाइवर्सिटी पार्क मेरी हांक लगाने लग गया. ऐसे ये दो किलोमीटर की दूरी भी काफी ऊंचाई (करीबन 300 मीटर) मांप लेती है. रुकते-सुस्ताते आखिर मैं 600 मीटर तक पहुँच ही गया.
नीचे चारो तरफ पुणे शहर की सुन्दरता देखते ही बनती थी. पर मन की सुन्दरता तो ऊपर पहाड़ पर ही देखने को मिली. एक वर्ष पहले जो 200 हेक्टेयर में फैला पहाड़ बंजर दिखता था अब काफी हरा-भरा हो गया था. और ये मुमकिन हुआ था यहाँ के निवासियों की बदौलत.
पहाड़ी पर हर 300 कदमों पर बने सम्प (नाद)  में पानी भर दिया जाता है. लोकल निवासियों की सुबह की सैर यहीं टर्मिनेट होती है. हर रोज सैकड़ो बुजुर्ग,बड़े, बच्चे, औरत- मर्द सम्प के पास रखे जर्किन में पानी भरकर पौधों को सींचते हैं. रविवार को तो कई NG0 भी इस शुभ कार्य में जुट जाते है.
हालाकि इन २० दिनों के प्रवास में मैं दो बार पहले भी यहाँ आया था पर शायद संकोच से अथवा प्रोटोकॉल की नासमझी से मैंने इस कार्य में योगदान नहीं दिया. एक कारण शायद मेरा बुरी तरह
थकना और सांस का फूलना भी रहा हो. पर आज नहीं. मेरी श्रीमती भी आज मेरे साथ थीं. पहुंचते ही उन्होंने सीचने का कार्य आरभ कर दिया. आनन-फानन में हमलोगों ने करीब 100 पौधों को सींचा होगा. एक घंटे की आउटिंग दो घंटे से ज्यादा की हो गयी. घर का नियमित कार्यकर्म बुलावा देने लग गया था. तय किया की अबसे रोज या जब अवसर मिले और तबीयत नासाज न रहे हमलोग तडके आयेंगे और 3-4 घंटे प्राकृतिक रहेंगे.

आज बिलकुल भी थकान नहीं लग रही है बल्कि मन बहुत ही प्रफुल्लित है.  

कागज़ के दो पंख लेके, उड़ा चला जाए रे
जहाँ नहीं जाना था ये, वहीँ चला हाय रे
उमर का ये ताना-बाना समझ ना पाए रे
जुबां पे जो मोह-माया, नमक लगाये रे
के देखे ना, भाले ना, जाने ना दाये रे
दिशा हारा कैमोन बोका, 
मोन्टा रे! 

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