मैं करीबन एक वर्ष बाद ट्रेन में सफ़र
कर रहा हूँ । लोगों की तमीज में अवश्य फर्क आया है । प्लेटफार्म में सफाई दिखती है
। अब लोग फर्श पर कचड़ा नहीं फेंकते हैं । हल्ला नहीं करते हैं । बुजुर्गों को सहूलियत देते हैं । लड़कियां ज्यादा निडर दिखती हैं
। हाँ पर ट्रेन के अच्छे दिन अभी भी नही आये हैं ।वही 30-40 वर्ष
पुरानी बोगीओ पर मुलम्मा । वही हर समय फेरीवालों की चहलकदमी । खाने का समान इतना बेकार की कोई एक्का-दुक्का
बेचारा ही आर्डर देता दिखाई देता था । और 20 घंटे
के सफ़र को 25 घंटे में शेड्यूल कर 25-30 घंटे में तय करना । मैनपावर और मैन ऑवर
की बिलकुल परवाह न करते हुए आबादी के इकोनॉमिक्स की वाट लगाना अच्छे दिन की गुहार
लगाने वालों की फितरत है । विडम्बना यह की सीनियर सिटीजन को सबसे ऊपर वाली बर्थ ।
इस बार नीचे की
तीनो बर्थ 25 से कम लोगो को मिली थीं । ऊपर की तीनो बर्थ 60-70 के स्लॉट को मिली
थीं । मैं साइड अपर पर था और नीचे एक 25 वर्ष का हट्टा-कट्टा attitude वाला नौजवान
। शायद कोई IT/MNC सेक्टर में काम कारता होगा । उसे पूरे वक्त अपने स्मार्ट फ़ोन पर
जहां-तहां बात करने, लैपटॉप, आई-पैड की पैतेरेबाजी से फुर्सत नहीं थी । एक बजे
उसने समय पर खाना खाया और बिना झिझकते हुए मुझे बताया की उसका अभी हाल में ही
ऑपरेशन हुआ है इसलिए please ...... । मैं सामने की बर्थ पर बची खाली जगह पर जाकर
बैठ गया । वह मरीज काफी सलीके से बिस्तर बिछा इयरफ़ोन लगाकर लेट गया और पूरे सफ़र लेटा
ही रहा । मेरी श्रीमतीजी जिन्हें काफी तकलीफदेह गठिया की शिकायत है,
और काफी थक गयी थीं, जैसे-तैसे ऊपर की बर्थ पर सोने चली गयीं । मेरे बगल में एक २०
साल की लडकी शुरू से 50 shades पढ़ती हुई बैठी थी । शायद वह सब भांप रही थी । उसने
मुझे पूछा की क्या वह ऊपर की बर्थ ले ले और वह मेरी ऊपर की साइड बर्थ पर लेटते हुए
पढने का आनंद लेने लगी और सो भी गयी । रात होने को आई । तभी साथ बैठे आर्मी के
जवान ने अपना नीचला बर्थ अदला-बदली करने की पेशकश की । हम दोनों बड़े आराम से नीचे
की बर्थ पर बैठते-सोते हुए सफ़र तय करने लगे.
आखिर हमलोगों का
अंतिम स्टेशन आया । जवान ने मुझे मेरा भारी सूटकेस उतारने में मदद की । वह रंगीला,
तुरत के ऑपरेशन से पीड़ित नौजवान 30 किलो का सूटकेस रोलर पर लुढ्काता हुआ और २०
किलो का कैर्रीबैग कंधे पर लटका बिना कुली
किये चलता बना ।
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