Saturday, 21 March 2015

एक ऐसा भी ट्रेन का सफर !

मैं करीबन एक वर्ष बाद ट्रेन में सफ़र कर रहा हूँ । लोगों की तमीज में अवश्य फर्क आया है । प्लेटफार्म में सफाई दिखती है । अब लोग फर्श पर कचड़ा नहीं फेंकते हैं । हल्ला नहीं करते हैं । बुजुर्गों को सहूलियत देते हैं । लड़कियां ज्यादा निडर दिखती हैं । हाँ पर ट्रेन के अच्छे दिन अभी भी नही आये हैं ।वही 30-40 वर्ष पुरानी बोगीओ पर मुलम्मा । वही हर समय फेरीवालों की चहलकदमी । खाने का समान इतना बेकार की कोई एक्का-दुक्का बेचारा ही आर्डर देता दिखाई देता था । और 20 घंटे के सफ़र को 25 घंटे में शेड्यूल कर 25-30 घंटे में तय करना । मैनपावर और मैन ऑवर की बिलकुल परवाह न करते हुए आबादी के इकोनॉमिक्स की वाट लगाना अच्छे दिन की गुहार लगाने वालों की फितरत है । विडम्बना यह की सीनियर सिटीजन को सबसे ऊपर वाली बर्थ
इस बार नीचे की तीनो बर्थ 25 से कम लोगो को मिली थीं । ऊपर की तीनो बर्थ 60-70 के स्लॉट को मिली थीं । मैं साइड अपर पर था और नीचे एक 25 वर्ष का हट्टा-कट्टा attitude वाला नौजवान । शायद कोई IT/MNC सेक्टर में काम कारता होगा उसे पूरे वक्त अपने स्मार्ट फ़ोन पर जहां-तहां बात करने, लैपटॉप, आई-पैड की पैतेरेबाजी से फुर्सत नहीं थी । एक बजे उसने समय पर खाना खाया और बिना झिझकते हुए मुझे बताया की उसका अभी हाल में ही ऑपरेशन हुआ है इसलिए please ...... । मैं सामने की बर्थ पर बची खाली जगह पर जाकर बैठ गया । वह मरीज काफी सलीके से बिस्तर बिछा इयरफ़ोन लगाकर लेट गया और पूरे सफ़र लेटा ही रहा मेरी श्रीमतीजी जिन्हें काफी तकलीफदेह गठिया की शिकायत है, और काफी थक गयी थीं, जैसे-तैसे ऊपर की बर्थ पर सोने चली गयीं । मेरे बगल में एक २० साल की लडकी शुरू से 50 shades पढ़ती हुई बैठी थी । शायद वह सब भांप रही थी । उसने मुझे पूछा की क्या वह ऊपर की बर्थ ले ले और वह मेरी ऊपर की साइड बर्थ पर लेटते हुए पढने का आनंद लेने लगी और सो भी गयी । रात होने को आई । तभी साथ बैठे आर्मी के जवान ने अपना नीचला बर्थ अदला-बदली करने की पेशकश की । हम दोनों बड़े आराम से नीचे की बर्थ पर बैठते-सोते हुए सफ़र तय करने लगे.

आखिर हमलोगों का अंतिम स्टेशन आया । जवान ने मुझे मेरा भारी सूटकेस उतारने में मदद की । वह रंगीला, तुरत के ऑपरेशन से पीड़ित नौजवान 30 किलो का सूटकेस रोलर पर लुढ्काता हुआ और २० किलो का कैर्रीबैग कंधे पर  लटका बिना कुली किये चलता बना । 

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