मैंने बहुतेरी होलियाँ देखी हैं । उनमें जो
सबसे ज्यादा मेरे मन को भाई वह थी मेल-मिलाप वाली होली । लोग ढोल बजाते एक घर से दूसरे
घर जाते थे, रंग लगाते थे, गले मिलते थे, पकवान खाते-खिलाते थे और फिर टोली और
बड़ी होकर दूसरे घर को जाती थी । सबकुछ ११ बजे से एक बजे तक में हंसी-ख़ुशी बीत जाता
था । सबकुछ बड़ी शालीनता से गुजर जाया करता था । हाँ, यह ख़याल रखा जाता था कि कोई
भूले-भटके भी छूट न जाए । उम्र के इस पड़ाव में, अब तो खैर होली एक देखने वाला
उत्सव हो गया है ।
इस बार की होली पुणे के पाषाण गाँव के एक बारह
मंजिला अपार्टमेंट में बीती । एक पखवारे अपने बेटे के पास रहने आया था ।वह भी हाल ही में इस फ्लैट में आया था । गो की आते-जाते,
लिफ्ट में, या फिर टेरेस पर इतना ठंडा आमना-सामना होता था कि होली कैसी बीतेगी इसका
अंदाज होने लगा था ।
शाम को सात बजे इंटरकॉम पर खबर आयी सबलोगों
को होलिका दहन के लिए क्लब कंपाउंड में 7:30 बजे आने की । सभीकुछ बड़े अच्छे तरीके
से बीता । बच्चे देर शाम से ही खेल रहे थे, गोय्ठे और लकड़ी के १५ किलो जमावट पर होलिका
जली । औरतों को जैसा भी समझ में आ रहा था पूजा कर रही थीं । बुजुर्ग किनारे
कुर्सिओं पर बैठे गप लड़ा रहे थे । पर किसी को नवगुन्तकों से जान-पहचान की ललक नहीं
थी और न वे मौक़ा ही दे रहे थे । मुझे तो यही मालूम था कि होली एक अत्यंत ही
सामाजिक त्यौहार है ।
दूसरे दिन नौ बजते-बजते बच्चे कंपाउंड में
जमा होकर होली खेलने लगे । कुछ रंग ख़त्म हो जाने पर या मन भर जाने पर चले जाते तो
उसकी जगह कुछ नए बच्चे ले लेते । मैं जब भी खिड़की के पास आता दो-तीन मिनट होली
उत्सव देखता । एक बजते-बजते मात्र तीन-चार बच्चे ही खेलते दिखे । पर तभी होली का एक
अत्यंत विचित्र आयाम देखने को मिला ।
एक जोड़ा तेजी से आया । जाहिर था मिया-बीबी ही
होंगे । पुरुष ने बाल्टी में नल से पानी भरा, पॉकेट से रंग निकाल कर मिलाया और उसकी
बीबी जो शायद सुबह से इस क्षण का इन्तजार कर रही थी, उसे भर-पूर नहला दिया । उसके
बाद इसी क्रम को बीबी ने दोहराया । अंत में पुरुष ने अबीर की पुडिया निकाली ।
दोनों ने एक-दूसरे के मुंह पर अबीर पोती । उसके बाद बाल्टी लेकर लौट गए । सभी कुछ
5 मिनट के अन्दर हो गया होगा । उनके जाने के तुरत बाद एक दूसरा जोड़ा आया । कमोबेश
उन्होंने भी इसी तरह की होली खेली । इसी तरह अढाई बजे तक तकरीबन १२-१५ जोड़े आये,
होली खेले और चले गए । ऐसा मालूम पड़ता था कि इन लोगों की दुनिया बस इन्ही तक सीमित हो या फिर अपने घर के आँगन की प्राइवेसी में होली खेल रहे हों. .
ये परिवार कुछ महीने या कुछ वर्षों से इसी
अपार्टमेंट में रह रहे होंगे । ज्यादातर एक ही प्रांत के होंगे । पढ़े-लिखे तो
अवश्य होंगे । 25-40 के स्लॉट की उम्र बड़ी जानदार कही जाती है । जब होली के
त्यौहार में ये रंग है तो बाकी दिनों का रंग क्या कैसा होगा यह जानने के लिए क्या
इतना सैंपल काफी नहीं है ।
आज शनिवार है, छुट्टी का दिन । मैं निगाहें
बरबस वीराने कंपाउंड की ओर मुड जाती थीं । मुझे तो यही मालूम था कि होली एक अत्यंत
ही सामाजिक त्यौहार है । पर आम लोगों की तरह मैं भी गलतियां दोहराता रहता हूँ । यह भी भूल जाता हूँ कि हमारे निराले , सबसे प्यारे भारत देश में इतनी जातियां क्यूं है, इतनी भाषाएँ क्यूं हैं, इतने भगवान् क्यों हैं ।
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