कोरोना संकट के दौरान पक्षियों
को शुद्ध जल से भरा गमला रखने के अतिरिक्त, मैंने
रोटी अथवा ब्रेड के टुकड़े भी बिखेरना आरम्भ कर दिया है. मुंडेर पर डाले गए टुकड़े
कौवे ले जाते थे और जमीन पर बिखरे दाने कबूतर को भाते थे. बाद में कबूतरों के
दो-तीन छोटे-छोटे झुण्ड आने लगे. उनमें आपस में लड़ाई भी होती थी.
एक कबूतर
मुझसे
परच गयी थी. वह ज्यादा भोली और शांतिप्रिय थी, छीना-झपटी से भाग कर वह मेरे पास आ जाती थी. उसके लिए मैं कुछ
बचाकर रखता था. खाने के बाद मेरे छत वाले स्टूडियो के मुंडेर पर बैठ जाती थी. जब
उसका झुण्ड उड़ता तब वह भी उड़ जाती. ये कबूतर थोड़ा सा भी खटका या हलचल होने पर डर कर उड़ जाते हैं.
यह सिलसिला चार महीने से निर्वाध
चल रहा था. कभी मुझे छत पर जाने में देर हो जाती तो कबूतरों की गुटरगूं नीचे कमरे
तक सुनायी देती. इधर बरसात में, मैं खुली छत के बजाय ऊपरे वाले कमरे में
ही बैठता हूँ. तब यह कबूतर शिकायत करने दरवाजे के अन्दर तक आ जाती.मैं दरवाजे के
बहर ही कुछ दाने या टुकड़े बिखेर देता.
कल सुबह स्टूडियो के एस्बेस्टस
छत पर कुछ गिरने-पड़ने की आवाज आयी. मैं जैसे ही बाहर निकला , कौवों
ने मुझपर आक्रमण कर दिया. मुझे सर उठाने तक का मौक़ा नहीं दिया.
लौट कर मैं कमरे में आकर कौवों के
शांत होने का इन्तजार करने लगा. मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि सांप ने किसी चिड़िया
को निवाला बना लिया है. बहुत सारे कौवे जमा होकर कांव-कांव करने लगे. आधे घंटे बाद
सबकुछ शांत हो गया.
आज सुबह जब मैं ऊपर पहुंचा तो
दो-तीन पंख गिरे मिले. वे कबूतर के थे. सांप तो पूरा का पूरा निगलता है, यह
अवश्य पड़ोस की बिल्ली होगी. पर बिल्ली तो अपना शिकार किसी सुरक्षित जगह ले जाकर
उदरस्थ करती है. बहुत मनन करने पर मैंने यह निष्कर्ष निकाला की यह करतूत किसी बाज
की ही हो सकती है. बाज के झपट्टे से बैठा कबूतर कभी नहीं बच पाता है. बाज अपना
शिकार जहां करता है वहीँ खा भी लेता है, उसके बाद उड़ जाता है.
मेरी परिचित भोली-भाली शांतिप्रिय कबूतर
कहीं नहीं दिख रही थी. मुझे बहुत ज्यादा
दुःख नहीं हुआ. मुझे ज्ञात था जो प्राणी ईश्वर को ज्यादा प्यारे होते हैं
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