पुणे के पाषाण इलाके में सुबह की सैर का मजा ही कुछ और है. चारो तरफ
फैली हुई पहाड़ी, ऊंचे-नीचे रस्ते, प्रत्येक 500 कदम पर मंदिर,
सुस्ताने-बतियाने-दृश्यावलोकन करने अथवा प्राणायाम करने के लिए बिछी हुई बेंचें और
आगे-पीछे उत्साहित करते सुबह के हर रंग और हर उम्र के हमसफर. ऐसी चमकती चौड़ी सड़के
और उनके गले में बाहें डालें चौड़े फूटपाथ, जैसे की रात भर हवाओं ने वातावरण एकदम
शुद्ध हमलोगों के स्वागत के लिए तैयार कर दिया हो. पीपल,गुलमोहर और नीम के पेड़
वातायन की शुद्धता में हर्बल सुगंध बिखेरते हुए मानों कह रहे हों की वहां जाकर
बताना कि स्वर्ग किसे कहते हैं.
दो महीने हो गए पाषाण में अवकाश बिताते हुए, अब जब जाने का समय आया है
तो लगता है कितना कुछ समेट लूं. एक घंटे की सुबह की सैर अब बढकर तीन घंटे की हो
गयी है. ज्यादातर, दोनों गिर्मे पार्क के पास स्थित बायोडायवर्सिटी पार्क जाते हैं.
तबीयत ठीक रहने पर, पहाड़ी पर चढ़कर पश्चिम का सुहावना दृश्य और पूरब से उदित हो रहे
सूर्य की छटा को साधुवाद देता हूँ. आजकल
आधे घंटे वही बैठकर प्राणायाम भी करते हैं हमलोग. लौटते समय हमलोगों ने पहाड़ी को
कृदग्यता और धन्यवाद देने का भी नायब तरीका ढूंढ लिया है.
पुणे की सभी पहाड़ियों का पर्यावीकरण और सुन्दरीकरण हो रहा है. ये पहाड़ी, जो पाषाण-सुस रोड के पश्चिमी किनारे पर है, उसे तो बायोडायवर्सिटी पार्क के
नाम से सुशोभित भी कर दिया गया है. कारपोरेशन ने सम्प बनाकर मोटर पंप से पानी
मुहैया कर दिया है. बच्चे-बूढ़े, NGO, शिक्षा संस्थान, कॉर्पोरेट घराने और सन्यासी
सभी कुछ समय निकाल कर पौधों को पानी देते हैं. यह कार्य पिछले 5 वर्ष से आरभ किया
गया है. अगले 5 वर्षों में इन पहाड़ियों की छटा देखने लायक होगी. प्रकृति भी सूद व्
बोनस के साथ इस उपकार को लौटाएगी ठंडी हवा, समय पर वर्षा और हर्बल सुगंध के साथ. हम दोनों भी मिलकर 50-60 पौधों को सीचतें हैं. एकदम महसूस होता है कि कुछ अच्छा कर रहे हैं.
लगभग 5 दिन पहले, मैंने देखा दो लड़कों को. एक की उम्र 15 वर्ष और दूसरे की 10 के आसपास.. एक छत लगी ठेलागाडी लेकर आये और पहाड़ी से सटे सड़क के किनारे उसे कामयाब कर चाय की दूकान का नक्शा देने लगे. दूसरे दिन, लौटते समय, उन दोनो बच्चों को उत्सुकता से ग्राहकों का इन्तजार करते पाया. तीसरे दिर बैचेनी से और चौथे दिन उदासी से. शायद दो-तीन बातें उधर से गुजरने वालों से सम्बन्ध जोड़ने में आड़े आ रही थी. अव्वल तो लोग लौटकर घर पहुंचते ही चाय पीते होगे इसलिए बेकार के खर्च से बचना, दूसरे सफाई व् रखाव, और तीसरा कोई उनके जैसा भी तो नहीं चाय पी रहा है. इतने दिनों में मैंने मात्र एक कैब वाले को चाय पीते देखा था.
लगभग 5 दिन पहले, मैंने देखा दो लड़कों को. एक की उम्र 15 वर्ष और दूसरे की 10 के आसपास.. एक छत लगी ठेलागाडी लेकर आये और पहाड़ी से सटे सड़क के किनारे उसे कामयाब कर चाय की दूकान का नक्शा देने लगे. दूसरे दिन, लौटते समय, उन दोनो बच्चों को उत्सुकता से ग्राहकों का इन्तजार करते पाया. तीसरे दिर बैचेनी से और चौथे दिन उदासी से. शायद दो-तीन बातें उधर से गुजरने वालों से सम्बन्ध जोड़ने में आड़े आ रही थी. अव्वल तो लोग लौटकर घर पहुंचते ही चाय पीते होगे इसलिए बेकार के खर्च से बचना, दूसरे सफाई व् रखाव, और तीसरा कोई उनके जैसा भी तो नहीं चाय पी रहा है. इतने दिनों में मैंने मात्र एक कैब वाले को चाय पीते देखा था.
19.05.2016: 0800 सुबह
परसों, जब दो घंटे के बाद पहाड़ी से नीचे उतर रहे थे, हमलोगों को उन
दोनों बच्चों की उदासी देखी नहीं गयी. मन बनाया कि चलो प्रमोट करके देखते हैं. पूछा- “कैसे चाय देते हो ?”
बड़े लड़के ने तपाक से जवाब दिया–“सर ! 6 का हाफ,10 का फुल. अभी
बनाया है.आपके के लिए अलग से बना दूं .”
अब जब प्रमोशन की बात थी तो अलग बनवाकर उसका खर्च बढ़ाना मुनासिब नहीं
लगा और दूसरे, बात तो दस वाली चाय से ही ज्यादा साकार होगी.
चाय ठीक थी पर चीनी जरूरत से बहुत ज्यादा थी. पहली चुस्की लेते ही
उसने पूछ लिया –"सर ! चाय ठीक है ना !”
मैंने कहा- “ बेटे ! अच्छी है पर चीनी ज्यादा है खासकर हम बुजुर्गों
के लिए. कल हमलोगों के लिए चीनी इसकी आधे से भी कम डालना.”
हमलोगों की देखा-देखी, एक दूसरा कैब वाला और एक व्यसक लड़के ने भी चाय
माँगी.
दोनों लड़कों की आँखों में चमक आ गयी थी . छोटे ने जाते-जाते मुझसे
कहा-“मेरी माँ बहुत अच्छा चाय बनाती है. कल उससे सीख कर आऊँगा.”
20.05.2016 0745 सुबह
कल, हमलोग जब लौटते हुए उसके पास से गुजरे तब किसी को वह चाय दे रहा
था. मेरी तरफ नजर नहीं थी. मैंने उसे गुड मोर्निंग कहा. उसने शरमाकर मुझे गुड
मोर्निंग कहा. आज की चाय बेहतर थी. इलायची की खुशबु आ रही थी पर चीनी अभी भी अधिक
थी. उसने मुझे भरोसा दिलाया कि कल वह अपनी माँ को लायेगा चाय बनाने.
तभी, प्राणायाम/योग करने वाले वापिस जाने के लिए उतरने लगे. उनमें से, शायद दो संचालक चायवाले के पास आये. उन्होंने शनिवार और रविवार के लिए 50-50 कप चाय का आर्डर दिया. साथ में हिदायत भी दी कि फुल चाय पर बड़े प्लास्टिक के मजबूत गिलास में देनी होगी.” उन्होंने 50 रुपये एडवांस भी किये. आज हमलोग चार जनों के आँखों में मुस्कराहट थी. उन दोनों
बच्चो की हंसी तो छिप भी नहीं पा रही थी.
बड़ा मेरे पास आया और उसने कहा – “कल आपलोग जरूर आईयेगा. मेरी तरफ से
स्पेशल चाय रहेगी.
मैंने उससे निम्बू, काला नमक, भुने हुए पीसे जीरे वाली चाय बनाने के बारे में भी बताया.
उसे बताया कि इधर दूर-दूर तक ऐसी चाय नहीं मिलती है. अगर ठेले में एक ऐसी चाय का
बैनर भी लगा लो तो तुम्हारी मोनोपोली हो जायेगी. मैं तो और भी बहुत सारे उम्रदराज
गुर बता सकता था लेकिन शायद वह कन्फ्यूज्ड हो जाता.
21.05.2016: 0645 सुबह
आज मै जल्दी ही आकर रोड की दूसरी तरफ बैठकर सामने का नजारा देखने लगा.
वे दोनों बच्चे अपना ठेला लेकर आ चुके थे. आज उनके साथ एक साथी भी था मदद के लिए. शायद उनके पिता भी आये थे जिनकी इतनी दूर से भी हरकतें अच्छी नहीं लग रही थीं. जगह की सफाई कर रहे थे और किसी बात पर
आपस में झगडा भी कर रहे थे. बड़े की नजर मोबाइल की घडी पर बार-बार जा रही थी. ऊपर
शेड में प्राणायाम/योग के पाठशाला लगी हुई थी. ठीक 07.30 बजे दोनों हाथ में भरी
केतली और प्लास्टिक की ग्लासेज लेकर ऊपर चाय देने बढे. दोनों अपने काम में इतने
मशगूल थे कि उनकी नजर एक बार भी मुझ पर टिक नहीं पाई. आज मैं उनके पास चाय पीने नहीं गया. वे पैसे नहीं लेते.
कितनी जल्दी, उन्हें कितना कुछ आ गया. चीनी का अंदाज, चाय का कप, गुड
मोर्निंग, मैनेजमेंट जिसमें ख़ास मौकों पर स्पेशलिस्ट को शामिल करना और हां स्पेशल
चाय का न्योता गुरु दक्षिणा के तौर पर. कोई बच्चों की ख़ुशी में नजराना लेता है
क्या ? जैसे जन्मदिन, नौकरी या परीक्षा में अव्वल आना.
अगर मैं फिर कभी पाषाण आऊँगा तो उन्हें आशीर्वाद देने अवश्य जाऊँगा.
वे अवश्य कामयाब होंगे.


हृदयस्पर्शी आलेख .
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