एक शाम धोबी अपने दोनों गदहों के साथ थका-हरा घाट से घर लौटा. एक गधे को उसने
पास पड़ी रस्सी खूंटे में बाँध दिया. परेशान था दूसरे गदहे को बांधने के लिए रस्सी
नहीं मिल रही थी. धोबिन ने उसकी परेशानी दूर कर दी.
गधे के नजदीक आकर गले में और
खूंटे में रस्सी बाँधने का नाटक कर चली गयी. सुबह गधा वैसा ही आरक्षित खड़ा मिला. वैसे
दोनों गधे रस्सी बंधवाने में कोई आनाकानी नहीं करते थे बल्कि धोबी की डंडे की मार
भी सह लेते थे बिना चिल्लपों किये. वे बहुत धैर्य से आने वाले अच्छे दिनों का इन्तजार
कर रहे थे. अपनी बेटी के आलसपने से परेशान
होकर धोबिन कहा करती थी कि वो उसकी शादी गधे से कर देगी. अब गधे तो दो थे. तो दोनों
गधों को अपनी-अपनी सुन्दरता और सोच-समझ पर गर्व था और उससे भी ज्यादा इस बात का कि
धोबिन की भाषा वही एक समझ सकता है दूसरा तो गधा है. 
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